मनरेगा की विदाई और वीबी जी राम जी की एंट्री से गांव, रोजगार और राजनीति में मचा घमासान

मनरेगा की जगह सरकार नया VB-G RAM G कानून लाने जा रही है। रोजगार के दिन 100 से बढ़ाकर 125 करने, फंडिंग में राज्यों की हिस्सेदारी और गांधी नाम हटाने पर सियासी घमासान तेज है। विपक्ष इसे गरीबों के अधिकारों पर हमला बता रहा है, जबकि सरकार इसे ग्रामीण विकास का नया मॉडल कह रही है।

अजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार

करीब दो दशक से ग्रामीण भारत की पहचान बन चुका महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम यानी मनरेगा अब अपने सबसे बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। केंद्र सरकार इसे खत्म कर इसकी जगह नया कानून लाने जा रही है, जिसका नाम रखा गया है विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार और आजीविका मिशन (ग्रामीण), यानी वीबी जी राम जी। सरकार इसे ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्य से जोड़कर देख रही है, जबकि विपक्ष इसे गरीबों के अधिकारों और गांधी की विरासत पर हमला बता रहा है। सवाल सिर्फ नाम बदलने का नहीं है, बल्कि यह बहस गांव, रोजगार, फंडिंग और अधिकारों के भविष्य से जुड़ गई है मनरेगा की शुरुआत 2005 में यूपीए सरकार के दौरान हुई थी। तब देश के बड़े हिस्से में ग्रामीण बेरोजगारी, पलायन और गरीबी गंभीर समस्या थी। इस कानून के तहत हर ग्रामीण परिवार को साल में कम से कम 100 दिन का अकुशल मजदूरी वाला काम देने की कानूनी गारंटी दी गई। 2009 में इसके नाम में महात्मा गांधी को जोड़ा गया। धीरे-धीरे यह योजना दुनिया की सबसे बड़ी रोजगार गारंटी योजना बन गई। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक बीते 20 वर्षों में मनरेगा के तहत 300 करोड़ से ज्यादा मानव-दिवस का सृजन हुआ। सिर्फ 2022-23 में ही करीब 6 करोड़ परिवारों को काम मिला और 289 करोड़ मानव-दिवस पैदा हुए। महिलाओं की भागीदारी औसतन 50 प्रतिशत के आसपास रही, जबकि अनुसूचित जाति और जनजाति की हिस्सेदारी कई वर्षों में 35 से 40 प्रतिशत तक पहुंची।

इन आंकड़ों के आधार पर विपक्ष का कहना है कि मनरेगा ने सिर्फ रोजगार नहीं दिया, बल्कि सामाजिक सुरक्षा का काम किया। सूखा, बाढ़ या आर्थिक संकट के समय यह योजना गांवों के लिए लाइफलाइन साबित हुई। कोरोना काल में भी मनरेगा ने रिकॉर्ड रोजगार दिया। 2020-21 में करीब 7.5 करोड़ परिवारों ने इस योजना के तहत काम किया और 389 करोड़ मानव-दिवस का सृजन हुआ, जो अब तक का सबसे ऊंचा स्तर था। उसी दौर में लाखों प्रवासी मजदूर शहरों से गांव लौटे और मनरेगा उनके लिए सहारा बना। अब सरकार का तर्क है कि ग्रामीण भारत की तस्वीर बदल चुकी है। सड़क, बिजली, शौचालय, बैंक खाते और डिजिटल सेवाओं की पहुंच बढ़ी है। नीति आयोग और सरकार के अपने आकलन के मुताबिक पिछले एक दशक में बहुआयामी गरीबी में बड़ी गिरावट आई है। सरकार का कहना है कि जब गांव बदल रहे हैं, तो रोजगार कानून भी बदलना चाहिए। इसी सोच के तहत वीबी जी राम जी विधेयक लाया जा रहा है। सरकार का दावा है कि नए कानून में रोजगार की गारंटी 100 दिन से बढ़ाकर 125 दिन की जाएगी, यानी साल में 25 दिन अतिरिक्त काम मिलेगा।

लेकिन इस दावे के साथ कई शर्तें भी जुड़ी हैं। नए कानून में फंडिंग का ढांचा बदलने का प्रस्ताव है। अभी मनरेगा में अकुशल मजदूरी का 100 प्रतिशत खर्च केंद्र सरकार उठाती है, जबकि सामग्री लागत में केंद्र और राज्य का अनुपात 75:25 है। नए विधेयक में मजदूरी के खर्च में भी राज्यों को हिस्सेदारी करनी होगी। प्रस्ताव के मुताबिक पूर्वोत्तर और पहाड़ी राज्यों के लिए केंद्र-राज्य अनुपात 90:10 रहेगा, जबकि बाकी राज्यों के लिए यह 60:40 हो सकता है। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि इससे आर्थिक रूप से कमजोर राज्यों पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा। कई राज्य पहले ही अपने हिस्से का भुगतान समय पर नहीं कर पाते, ऐसे में रोजगार के अवसर घटने की आशंका है। एक और बड़ा बदलाव खेती के मौसम को लेकर प्रस्तावित है। नए कानून में बुवाई और कटाई के पीक सीजन में रोजगार गारंटी पर अस्थायी ब्रेक का प्रावधान रखा जा सकता है। सरकार का तर्क है कि इससे कृषि कार्य प्रभावित नहीं होंगे और खेतों में मजदूरों की कमी नहीं होगी। लेकिन ग्रामीण संगठनों का कहना है कि यही वह समय होता है, जब खेतिहर मजदूरों को सबसे ज्यादा आय की जरूरत होती है। अगर साल के करीब 60 दिन रोजगार पर रोक लगेगी, तो 125 दिन की गारंटी कागजों तक सिमट सकती है।

मजदूरी भुगतान को लेकर सरकार साप्ताहिक भुगतान की बात कर रही है, जो कागज पर आकर्षक लगती है। अभी मनरेगा में 15 दिन के भीतर भुगतान का प्रावधान है, लेकिन कई राज्यों में भुगतान में महीनों की देरी होती रही है। वित्त वर्ष 2023-24 में ही मजदूरी भुगतान में देरी के मामलों में हजारों करोड़ रुपये की बकाया राशि सामने आई थी। सरकार कहती है कि नई तकनीक और डिजिटल सिस्टम से यह समस्या दूर होगी, लेकिन सवाल यह है कि जब फंडिंग का बोझ बढ़ेगा, तो भुगतान समय पर कैसे होगा।सबसे बड़ा विवाद योजना के नाम से महात्मा गांधी को हटाने को लेकर है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने इसे सियासी और वैचारिक कदम बताया है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का कहना है कि यह सिर्फ नाम बदलने का मामला नहीं है, बल्कि अधिकार आधारित कानून को कमजोर करने की साजिश है। प्रियंका गांधी ने संसद में सवाल उठाया कि गांधी का नाम हटाने की क्या जरूरत थी, जब पूरी दुनिया उन्हें सम्मान देती है। कांग्रेस का आरोप है कि बीजेपी-आरएसएस की राजनीति में गांधी फिट नहीं बैठते, इसलिए योजनाओं और संस्थानों से उनके नाम हटाए जा रहे हैं।

कांग्रेस ने यह भी गिनाया कि पिछले 11 वर्षों में मोदी सरकार ने यूपीए काल की 30 से ज्यादा योजनाओं के नाम बदले हैं। इंदिरा आवास योजना को प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण किया गया, जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीकरण मिशन की जगह अमृत योजना लाई गई, राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना को दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना में बदला गया। कांग्रेस का कहना है कि अब मनरेगा के साथ भी वही पैटर्न दोहराया जा रहा है, ताकि कांग्रेसी विरासत मिटाई जा सके।सरकार इन आरोपों को खारिज करती है। ग्रामीण विकास मंत्रालय का कहना है कि नाम बदलने से ज्यादा अहम है योजना का असर। मंत्रालय के मुताबिक नया कानून ग्रामीण आजीविका को रोजगार से आगे ले जाकर कौशल, टिकाऊ संपत्ति और स्थानीय विकास से जोड़ेगा। सरकार का दावा है कि इससे गांवों में पानी संरक्षण, सड़क, तालाब और अन्य स्थायी परिसंपत्तियों का निर्माण बढ़ेगा, जिससे लंबी अवधि में रोजगार के अवसर खुद पैदा होंगे। फिलहाल यह साफ है कि मनरेगा से वीबी जी राम जी तक का सफर सिर्फ एक प्रशासनिक बदलाव नहीं है। यह ग्रामीण गरीबों के अधिकार, केंद्र-राज्य संबंध और देश की राजनीति से गहराई से जुड़ा मुद्दा बन चुका है। एक तरफ सरकार विकास और बदलाव की बात कर रही है, दूसरी तरफ विपक्ष और मजदूर संगठन आशंकित हैं कि कहीं यह बदलाव रोजगार गारंटी को कमजोर न कर दे। आने वाले दिनों में संसद की बहस और जमीन पर इसके असर से ही तय होगा कि यह कदम ग्रामीण भारत के लिए नई उम्मीद बनेगा या एक बड़े विवाद की शुरुआत।

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