भारत-पाक तनाव: जयशंकर का ‘बुरा पड़ोसी’ बयान और सिंधु जल समझौते पर सख्त रुख

भारत ने पाकिस्तान के आतंकवाद और सिंधु जल विवाद के बीच सख्त रुख अपनाया है। चेनाब नदी पर नई जल विद्युत परियोजना के माध्यम से भारत अपनी संप्रभुता, सुरक्षा और जल संसाधनों पर नियंत्रण मजबूत कर रहा है। यह कदम पाकिस्तान और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को स्पष्ट रणनीतिक संदेश देता है।

अजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार

भारत-पाकिस्तान संबंध एक बार फिर तनावपूर्ण दौर में हैं। इस बार मामला सिंधु जल समझौता और पाकिस्तान की ओर से भारत में आतंकवाद फैलाने की घटनाओं के चलते उभरा है। शुक्रवार, 2 जनवरी 2026 को IIT मद्रास में एक कार्यक्रम में भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने पाकिस्तान का नाम लिए बगैर बेहद सटीक और कड़ा संदेश दिया कि भारत को अपने नागरिकों और राष्ट्रीय हितों की रक्षा का पूरा अधिकार है। उन्होंने कहा, अगर कोई देश जानबूझकर, लगातार और बिना किसी पश्चाताप के आतंकवाद को बढ़ावा देता है, तो भारत को अपने लोगों की रक्षा करने का पूरा हक है और वह इस अधिकार का इस्तेमाल करेगा। जयशंकर के इस बयान को केवल राजनीतिक व्यंग्य या सामान्य कूटनीतिक तर्क नहीं माना जा सकता। यह भारत की विदेश नीति में स्ट्रेटेजिक और निर्णायक बदलाव का संकेत है, जिसमें आतंकवाद और द्विपक्षीय समझौते को समानांतर नहीं रखा जाएगा। उनका कहना था कि भारत केवल अपने संप्रभु अधिकार का उपयोग करेगा और कोई भी देश यह तय नहीं कर सकता कि भारत को क्या करना चाहिए और क्या नहीं। यह बयान न केवल पाकिस्तान को बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भी यह संदेश देता है कि भारत अब अपने सुरक्षा निर्णयों में किसी बाहरी दबाव को स्वीकार नहीं करेगा।

सिंधु जल समझौता (Indus Waters Treaty, 1960) भारत और पाकिस्तान के बीच हुए सबसे स्थायी और अंतरराष्ट्रीय रूप से मान्यता प्राप्त समझौतों में से एक है। इसमें कुल 6 नदियाँ शामिल हैं  चिनाब, झेलम, रावी, सतलज, ब्यास और इंडिया, जिनमें से पाकिस्तान को पश्चिमी नदियों (चिनाब, झेलम, सतलज का हिस्सा) पर अधिकार मिला है, जबकि भारत को पूर्वी नदियों (सतलज, ब्यास, रावी) का पानी उपयोग करने की अनुमति दी गई।हालांकि, समय के साथ यह समझौता तनाव का कारण भी बन गया। पहलगाम की बैसरन घाटी में हुए आतंकवादी हमले के बाद भारत ने मई 2025 में इस समझौते को अनिश्चित काल के लिए निलंबित कर दिया। उस हमले में कई पर्यटकों की हत्या कर दी गई थी और भारत ने इसे पाकिस्तान द्वारा आतंकवाद के समर्थन के रूप में देखा। इसके बाद पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के खिलाफ शिकवा-शिकायतें शुरू कीं, लेकिन किसी तरह का वास्तविक लाभ उन्हें नहीं मिला।सिंधु जल प्रणाली में कुल 207.6 अरब घन मीटर पानी उपलब्ध है। इसमें से लगभग 167.2 अरब घन मीटर पाकिस्तान को जाता है और भारत को 40.4 अरब घन मीटर मिलता है। यह आंकड़ा स्पष्ट करता है कि पानी पर नियंत्रण केवल कृषि या ऊर्जा का मामला नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और भू-राजनीतिक शक्ति का मामला भी है।

भारत ने अब चेनाब नदी पर दुलहस्ती स्टेज-II पावर प्रोजेक्ट बनाने का निर्णय लिया है। पर्यावरण मंत्रालय की समिति ने इसके लिए अनुमति दे दी है। यह परियोजना केवल जल विद्युत उत्पादन का साधन नहीं है, बल्कि पाकिस्तान को यह संदेश देने का भी एक तरीका है कि भारत अब अपनी संपूर्ण जल संप्रभुता का प्रयोग करेगा।इस परियोजना से पाकिस्तान को मिलने वाले पानी पर अप्रत्यक्ष नियंत्रण बनेगा। पाकिस्तान ने कहा कि भारत ने नई परियोजना के बारे में उन्हें जानकारी नहीं दी, और इसे जल विवाद को और बढ़ाने वाला कदम बताया। वहीं भारत का रुख साफ है कि आतंकवाद और द्विपक्षीय समझौते एक साथ नहीं चल सकते।

जयशंकर ने यह स्पष्ट किया कि भारत किसी भी देश को यह अनुमति नहीं देगा कि वह पानी साझा करने की मांग करे, जबकि वही देश भारत में आतंकवाद फैलाता रहे। उन्होंने कहा, “हम अपनी सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए जो भी जरूरी होगा, वह करेंगे। किसी को यह तय करने का हक नहीं कि हमें क्या करना चाहिए और क्या नहीं।”यह बयान पाकिस्तान को संदेश है कि अंतरराष्ट्रीय समझौते केवल तभी मान्य होंगे जब पड़ोसी देश अपने दायित्वों को निभाए। उनका कहना था कि अच्छे पड़ोसी के बिना किसी समझौते का लाभ नहीं लिया जा सकता। यह विश्लेषण भारतीय दृष्टिकोण से बहुत गहन है, क्योंकि अब भारत अपने अधिकारों को केवल न्यायसंगत और अंतरराष्ट्रीय कानून के आधार पर ही लागू करेगा।

भारत का यह कदम पाकिस्तान के लिए राजनीतिक दबाव का नया स्रोत बन गया है। पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस मामले को उठाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन किसी भी देश ने अभी तक इसे गंभीरता से समर्थन नहीं दिया। यह संकेत है कि वैश्विक समुदाय अब आतंकवाद और द्विपक्षीय समझौते के बीच प्राथमिकता के मामले में भारत के पक्ष में है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत का यह कदम केवल सिंधु जल समझौते या जल विद्युत परियोजना तक सीमित नहीं है। यह भू-राजनीतिक संदेश है कि भारत अपनी संप्रभुता, सुरक्षा और नागरिकों की रक्षा के लिए निर्णायक कदम उठा सकता है। इसके साथ ही यह पाकिस्तान के लिए चेतावनी है कि अगर वह आतंकवाद को जारी रखता है, तो भारत अपने जल संसाधनों और राष्ट्रीय हितों का प्रयोग पूरी तरह स्वतंत्र रूप से करेगा।

यदि पाकिस्तान ने आतंकवाद को नियंत्रित नहीं किया और भारत ने अपनी नई परियोजना पूरी कर ली, तो यह दोनों देशों के बीच जल और सुरक्षा विवादों को और गहरा कर सकता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अंतरराष्ट्रीय दबाव के बावजूद भारत अपने निर्णयों में लचीलापन नहीं दिखाएगा। इसके अलावा, यह कदम भारत को अपने सांस्कृतिक और आर्थिक विकास में सहायक जल संसाधनों का पूर्ण उपयोग करने में सक्षम बनाएगा।भारत का यह रुख यह भी संकेत करता है कि भविष्य में किसी भी द्विपक्षीय समझौते या सहयोग को तभी महत्व दिया जाएगा, जब दोनों पक्ष अंतरराष्ट्रीय नियमों, सुरक्षा और भरोसे के आधार पर समझौते को निभाएँ। आतंकवाद और द्विपक्षीय समझौते साथ-साथ नहीं चल सकते  यही नीति अब भारत की स्पष्ट प्राथमिकता बन चुकी है।

एस. जयशंकर का बयान और भारत द्वारा चेनाब नदी पर जल विद्युत परियोजना का निर्णय इस बात को स्पष्ट करता है कि भारत अब अपने पड़ोसी देशों के साथ संबंधों में सख्त और निर्णायक रुख अपनाने में दृढ़ है। आतंकवाद के खिलाफ भारत का रुख संप्रभु और निर्णायक होगा। साथ ही, जल और ऊर्जा संसाधनों का उपयोग भारत अपनी जरूरतों और सुरक्षा के अनुसार करेगा।इस पूरी स्थिति में यह साफ है कि पाकिस्तान के लिए जल और सुरक्षा के मुद्दे अब केवल द्विपक्षीय समझौते तक सीमित नहीं रह गए हैं। भारत ने अपने नागरिकों और राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए पूर्ण अधिकार सुरक्षित कर लिया है। भविष्य में भारत-पाकिस्तान संबंधों में यह मुद्दा लंबे समय तक राजनीतिक और कूटनीतिक तनाव का केंद्र बना रहेगा।भारत का यह कदम न केवल राष्ट्रीय सुरक्षा और जल संसाधनों के नियंत्रण को मजबूत करता है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह संदेश देता है कि भारत अपने निर्णयों में स्वतंत्र, संप्रभु और रणनीतिक रहेगा।

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