दही-चूड़ा के बहाने तेज प्रताप ने फिर खोल दिए बिहार राजनीति के बंद दरवाजे

बिहार की राजनीति में दही-चूड़ा फिर बना सियासी संकेत। तेज प्रताप यादव के भोज ने नीतीश कुमार, एनडीए और आरजेडी के रिश्तों पर सवाल खड़े किए। लालू यादव की गैरमौजूदगी, खुले न्योते और पुराने समीकरणों ने सत्ता संतुलन की नई अटकलें पैदा कीं।

अजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार

बिहार की राजनीति में दही-चूड़ा महज मकर संक्रांति का पारंपरिक व्यंजन नहीं रहा, बल्कि यह तीन दशक से ज्यादा समय से सत्ता के संकेत, रिश्तों की परीक्षा और बदलते गठबंधनों का आईना बन चुका है। 1990 के बाद जिस परंपरा को लालू प्रसाद यादव ने मुख्यमंत्री आवास से शुरू किया था, वही परंपरा इस बार नए हाथों में, नए मकसद के साथ और नई बेचैनी पैदा करते हुए सामने आई है। इस बार लालू यादव खुद दही-चूड़ा भोज से दूर हैं और उनके बड़े बेटे तेज प्रताप यादव ने यह जिम्मेदारी संभाली है। फर्क सिर्फ इतना नहीं है कि आयोजन की जगह बदली है, फर्क यह भी है कि यह भोज सत्ता में बैठे किसी नेता का नहीं, बल्कि राजनीतिक तौर पर अलग-थलग पड़े एक नेता का है, जिसने एक थाली के जरिए पूरे सियासी तंत्र को सोचने पर मजबूर कर दिया है। आरजेडी ने साफ कर दिया कि इस साल लालू प्रसाद यादव के आवास पर पारंपरिक दही-चूड़ा भोज नहीं होगा। स्वास्थ्य को वजह बताया गया, लेकिन बिहार की राजनीति में खालीपन अपने आप सवाल पैदा करता है। उसी खाली जगह में तेज प्रताप यादव का आयोजन खड़ा हो गया। पटना के 26, एम स्ट्रैंड रोड स्थित आवास पर रखे गए इस भोज में न सत्ता और विपक्ष की रेखा खींची गई, न परिवार और विरोधियों की। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान, दोनों उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और विजय सिन्हा, सत्ता पक्ष के मंत्री, विपक्ष के नेता, परिवार के सदस्य और पुराने रिश्तेदार सबको न्योता दिया गया। बिहार की राजनीति में ऐसा खुला आमंत्रण अपने आप में असामान्य है।

तेज प्रताप यादव का खुद राबड़ी आवास जाकर तेजस्वी यादव को न्योता देना इस पूरे घटनाक्रम का सबसे अहम राजनीतिक दृश्य बन गया। तस्वीरों में दोनों भाई साथ दिखे। तेज प्रताप मुस्कुराते नजर आए, जबकि तेजस्वी यादव गंभीर थे। बिहार की राजनीति में भाव-भंगिमा भी संदेश मानी जाती है। लंबे समय से यह धारणा रही है कि तेज प्रताप और परिवार के बीच दूरी बढ़ी है। ऐसे में घर जाकर न्योता देना और भतीजी कात्यायनी को गोद में लेकर तस्वीर साझा करना सिर्फ पारिवारिक भावुकता नहीं, बल्कि यह दिखाने की कोशिश भी है कि तेज प्रताप खुद को लालू परिवार से बाहर नहीं मानते।दही-चूड़ा भोज का राजनीतिक महत्व आंकड़ों से भी समझा जा सकता है। 2015 के विधानसभा चुनाव में 243 सीटों वाली बिहार विधानसभा में महागठबंधन ने 178 सीटें जीती थीं, जिसमें आरजेडी को अकेले 80 सीटें मिली थीं। वहीं एनडीए 58 सीटों पर सिमट गया था। उसी दौर में दही-चूड़ा भोज गठबंधन की मजबूती का प्रतीक माना गया। 2017 में जब नीतीश कुमार ने महागठबंधन छोड़ा, तब भी मकर संक्रांति पर राबड़ी आवास में नीतीश की मौजूदगी और लालू यादव का दही का टीका चर्चा का विषय बना था। कुछ ही महीनों बाद सत्ता समीकरण पलट गया। 2020 के विधानसभा चुनाव में जेडीयू 2015 की 71 सीटों से गिरकर 43 पर आ गई, जबकि आरजेडी 75 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी। उस चुनाव से पहले चिराग पासवान का दही-चूड़ा भोज और बाद में एनडीए को हुआ नुकसान आज भी राजनीतिक विश्लेषण का हिस्सा है।

अब यही ऐतिहासिक पृष्ठभूमि तेज प्रताप यादव के आयोजन को और गहरा बना देती है। तेज प्रताप यादव कोई हाशिए का नाम नहीं हैं। वे मंत्री रह चुके हैं, आरजेडी के प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं और लालू यादव के बड़े बेटे हैं। हालांकि पार्टी और परिवार से दूरी के बाद उनकी राजनीतिक स्थिति कमजोर हुई, लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं हुई। 2024 के लोकसभा चुनाव में आरजेडी ने बिहार की 40 सीटों में से 23 पर जीत दर्ज की, जबकि एनडीए को 17 सीटें मिलीं। इन नतीजों के बाद भी राज्य की राजनीति में अस्थिरता बनी रही। ऐसे माहौल में तेज प्रताप का दही-चूड़ा भोज सिर्फ परंपरा निभाने का मामला नहीं रह जाता।इस आयोजन की सबसे दिलचस्प परत यह है कि तेज प्रताप यादव ने उन नेताओं को भी न्योता दिया है, जो कभी लालू यादव के करीबी थे और आज एनडीए का हिस्सा हैं। रामकृपाल यादव इसका बड़ा उदाहरण हैं। वे लंबे समय तक आरजेडी के रणनीतिकार रहे, बाद में पार्टी से अलग हुए और अब भाजपा कोटे से मंत्री हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में वे मीसा भारती से हार गए थे, लेकिन विधानसभा चुनाव जीतकर सत्ता में बने हुए हैं। उनका यह कहना कि तेज प्रताप के साथ उनके पारिवारिक रिश्ते 30-35 साल पुराने हैं और वे उन्हें आशीर्वाद देने जाएंगे, इस आयोजन को राजनीतिक रूप से और वजन देता है।

इतना ही नहीं, तेज प्रताप यादव ने अपने मामा और पूर्व सांसद साधु यादव को भी न्योता दिया है। साधु यादव लंबे समय से लालू परिवार के आलोचक रहे हैं और तेज प्रताप के निजी जीवन से जुड़े विवादों पर खुलकर बयान देते रहे हैं। इसके बावजूद उन्हें आमंत्रित करना यह दिखाता है कि तेज प्रताप इस भोज को टकराव नहीं, बल्कि संवाद का मंच बनाना चाहते हैं। बिहार की राजनीति में जहां रिश्ते अक्सर स्थायी दुश्मनी में बदल जाते हैं, वहां यह कदम अलग संदेश देता है।तेज प्रताप यादव का डिप्टी सीएम विजय सिन्हा के दही-चूड़ा भोज में शामिल होना और फिर अपने आयोजन की घोषणा करना भी संयोग नहीं माना जा रहा। विजय सिन्हा का यह कहना कि ‘वक्त पर सब पता चल जाएगा’ और तेज प्रताप का जवाब कि ‘समय आने दीजिए’ इन दोनों बयानों ने राजनीतिक हलकों में अटकलों को और तेज कर दिया है। सवाल यह उठने लगा है कि क्या तेज प्रताप यादव एनडीए की ओर किसी नए समीकरण की तलाश में हैं या फिर वे सिर्फ अपनी राजनीतिक मौजूदगी दर्ज कराना चाहते हैं।

बिहार की राजनीति में संख्या का खेल हमेशा निर्णायक रहा है। 243 सीटों की विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 122 है। ऐसे में छोटे-से छोटे राजनीतिक समूह और प्रभावशाली व्यक्ति भी सत्ता संतुलन में अहम भूमिका निभा सकते हैं। तेज प्रताप यादव के पास फिलहाल बड़ा संगठन या संख्या बल नहीं है, लेकिन उनके पास नाम है, विरासत है और राजनीतिक अनुभव है। दही-चूड़ा भोज के जरिए वे यह याद दिला रहे हैं कि वे अभी खेल से बाहर नहीं हुए हैं। असल में, यह आयोजन शक्ति प्रदर्शन नहीं, बल्कि संभावनाओं का प्रदर्शन है। बिहार की राजनीति में कई बार ऐसे ही प्रतीकात्मक कदम आगे चलकर बड़े फैसलों की भूमिका बनते हैं। दही-चूड़ा की थाली इस बार भी वही कर रही है राजनीति को बोलने का मौका देना। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार बोलने वाला मंच सत्ता में बैठा नहीं, बल्कि सत्ता के चारों ओर घूम रहा है। तेज प्रताप यादव का यह भोज बताता है कि बिहार की राजनीति में परंपराएं खत्म नहीं होतीं, वे बस नए किरदारों के हाथों में चली जाती हैं। अब यह आने वाला वक्त बताएगा कि यह थाली सिर्फ रस्म अदायगी तक सीमित रहती है या फिर बिहार की सियासत में किसी नए मोड़ की भूमिका बनती है।

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