भाजपा में युवा नेतृत्व का दांव, नितिन नबीन के कंधों पर 2029 की सियासी जिम्मेदारी
नितिन नबीन के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के साथ भाजपा ने युवा नेतृत्व और भविष्य की राजनीति पर बड़ा दांव लगाया है। उनके सामने 2029 तक पार्टी की संगठनात्मक मजबूती, चुनावी विस्तार और सामाजिक इंजीनियरिंग को आगे बढ़ाने की चुनौती है, जो पार्टी के नए युग का संकेत देती है।


भारतीय जनता पार्टी ने नितिन नबीन को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाकर सिर्फ संगठन की कमान नहीं सौंपी, बल्कि यह साफ कर दिया कि पार्टी अब आने वाले दस–पंद्रह वर्षों की राजनीति को ध्यान में रखकर फैसले ले रही है। 45 वर्ष की उम्र में नबीन भाजपा के अब तक के सबसे युवा राष्ट्रीय अध्यक्ष बने हैं और यही तथ्य इस बदलाव को साधारण नहीं रहने देता। यह ताजपोशी ऐसे समय में हुई है जब भाजपा लगातार तीसरी बार केंद्र में सत्ता में है और देश की राजनीति एक बार फिर संक्रमण के दौर से गुजर रही है, जहां जाति जनगणना, युवा मतदाता, क्षेत्रीय असंतुलन और संगठनात्मक थकान जैसे मुद्दे एक साथ खड़े हैं।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने पिछले एक दशक में अभूतपूर्व विस्तार किया है। पार्टी की मौजूदगी आज 20 से ज्यादा राज्यों में सत्ता या सत्ता के आसपास है। 2014 के बाद से भाजपा का वोट शेयर राष्ट्रीय स्तर पर लगातार बढ़ा है और लोकसभा चुनावों में पार्टी 37 प्रतिशत से अधिक मतों के साथ सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बनी हुई है। पंचायत से लेकर संसद तक संगठन को मजबूत करने की जिस रणनीति पर मोदी और अमित शाह ने काम किया, उसी का परिणाम है कि भाजपा आज देश की इकलौती ऐसी पार्टी है, जिसकी बूथ लेवल मशीनरी लगभग हर राज्य में सक्रिय है। लेकिन इसी मजबूती के साथ एक सवाल भी खड़ा हुआ क्या यह ढांचा आने वाली पीढ़ी की राजनीति के लिए खुद को ढाल पाएगा?
नितिन नबीन की ताजपोशी इसी सवाल का जवाब मानी जा रही है। अपने पहले भाषण में उन्होंने खुद को सामान्य कार्यकर्ता बताते हुए यह संदेश दिया कि भाजपा में पद नहीं, प्रक्रिया और संगठन सर्वोपरि है। यह बात इसलिए भी अहम है क्योंकि लंबे समय से विपक्ष भाजपा पर “केंद्रीकृत नेतृत्व” का आरोप लगाता रहा है। नबीन का आगे आना पार्टी के भीतर नेतृत्व की दूसरी पंक्ति को मजबूत करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।नबीन के सामने सबसे बड़ी चुनौती प्रधानमंत्री मोदी के उस राजनीतिक विज़न को जमीन पर उतारने की है, जिसमें युवाओं की सीधी भागीदारी पर जोर है। 15 अगस्त 2024 को लाल किले से पीएम मोदी ने एक लाख नए युवाओं को राजनीति में लाने का आह्वान किया था। आंकड़ों के लिहाज से देखें तो देश में 18 से 35 वर्ष के मतदाताओं की संख्या करीब 36 करोड़ के आसपास है, यानी कुल वोटर्स का लगभग 40 प्रतिशत। यह वही वर्ग है जो सोशल मीडिया, रोजगार, शिक्षा और पहचान की राजनीति से सबसे ज्यादा प्रभावित होता है। नितिन नबीन ने साफ कहा कि राजनीति कोई शॉर्ट टर्म कोर्स नहीं, बल्कि लंबी साधना है। यह बयान उन युवाओं के लिए संदेश है जो त्वरित सफलता की राजनीति में विश्वास रखते हैं।
भाजपा के सामने तत्काल राजनीतिक चुनौती पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव हैं असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी। इन राज्यों की सियासी तस्वीर एक जैसी नहीं है। असम में भाजपा अपने दम पर सरकार चला रही है, लेकिन बंगाल में तृणमूल कांग्रेस, तमिलनाडु में द्रविड़ दल और केरल में वाम मोर्चा अब भी मजबूत हैं। आंकड़े बताते हैं कि पश्चिम बंगाल में 2021 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने करीब 38 प्रतिशत वोट शेयर हासिल किया था, लेकिन सत्ता से दूर रह गई। तमिलनाडु और केरल में भाजपा का वोट शेयर अब भी दहाई के आसपास है। नितिन नबीन के सामने सवाल यह नहीं है कि पार्टी तुरंत सत्ता में आए, बल्कि यह है कि संगठन को वहां टिकाऊ कैसे बनाया जाए।दक्षिण भारत भाजपा के लिए लंबे समय से सबसे कठिन क्षेत्र रहा है। कर्नाटक को छोड़ दें तो पार्टी अब तक वहां व्यापक स्वीकार्यता हासिल नहीं कर पाई है। नबीन के नेतृत्व में भाजपा को यह तय करना होगा कि वह उत्तर भारत के मॉडल को दक्षिण में लागू करेगी या फिर स्थानीय सामाजिक और सांस्कृतिक समीकरणों के हिसाब से नई रणनीति बनाएगी। यह फैसला आसान नहीं है, क्योंकि दक्षिण की राजनीति जाति से ज्यादा भाषा, क्षेत्रीय अस्मिता और सामाजिक न्याय के इर्द-गिर्द घूमती रही है।
सोशल इंजीनियरिंग भाजपा की सबसे बड़ी ताकत भी है और सबसे बड़ी परीक्षा भी। एक दौर था जब पार्टी को ब्राह्मण, बनिया और ठाकुरों की पार्टी कहा जाता था, लेकिन पिछले दस वर्षों में मोदी ने इस छवि को काफी हद तक बदला है। ओबीसी और दलित वर्ग में भाजपा की पैठ बढ़ी है। 2019 के लोकसभा चुनाव में ओबीसी और गैर-यादव पिछड़ी जातियों का बड़ा हिस्सा भाजपा के साथ आया। अब जाति जनगणना के बाद जब विभिन्न वर्गों की वास्तविक संख्या सामने आएगी, तब राजनीतिक दबाव और अपेक्षाएं दोनों बढ़ेंगी। नितिन नबीन के सामने चुनौती यह होगी कि वह जातिगत आंकड़ों के इस नए यथार्थ में भाजपा की हिंदुत्व आधारित एकजुटता को कैसे बनाए रखें।आरएसएस लंबे समय से भविष्य की लीडरशिप तैयार करने की बात करता रहा है। संगठन का मानना है कि सिर्फ करिश्माई नेतृत्व के भरोसे लंबी राजनीतिक पारी नहीं खेली जा सकती। नितिन नबीन की नियुक्ति को इसी वैचारिक सोच का परिणाम माना जा रहा है। भाजपा यह संदेश देना चाहती है कि पार्टी में नेतृत्व का विकल्प मौजूद है और संगठन किसी एक चेहरे पर निर्भर नहीं है।कुल मिलाकर नितिन नबीन की ताजपोशी भाजपा के लिए एक राजनीतिक प्रयोग भी है और एक जरूरत भी। 2029 और उसके बाद के भारत में मतदाता और मुद्दे दोनों बदलेंगे। युवा, शहरी मध्यम वर्ग, नई जातिगत समीकरण और क्षेत्रीय असंतोष इन सबके बीच भाजपा को खुद को प्रासंगिक बनाए रखना होगा। नितिन नबीन के सामने चुनौती सिर्फ चुनाव जीतने की नहीं, बल्कि उस संगठनात्मक ऊर्जा को जिंदा रखने की है, जिसने भाजपा को देश की सबसे ताकतवर पार्टी बनाया। आने वाले महीनों में विधानसभा चुनाव, संगठनात्मक फैसले और युवाओं की भागीदारी यह तय करेगी कि यह ‘पीढ़ी परिवर्तन’ भाजपा के लिए कितना कारगर साबित होता है।



