बंगाल की राजनीति में अमित शाह की एंट्री क्या सचमुच ममता के किले को हिला पाएगी
नए साल के साथ पश्चिम बंगाल की सियासत में चुनावी हलचल तेज हो गई है। अमित शाह के तीन दिवसीय दौरे ने बीजेपी की रणनीति को धार दी है। घुसपैठ, भ्रष्टाचार, हिंदुत्व, सोनार बांग्ला और बंगाली विरासत के मुद्दों पर पार्टी ममता बनर्जी को घेरने की तैयारी में जुट गई है।


नया साल आते ही पश्चिम बंगाल की राजनीति में कमल की सुगंध फैलाने की कोशिशें जोर पकड़ रही हैं। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने हाल ही में तीन दिनों का दौरा कर बीजेपी को एक नया जोश भर दिया है। उनका यह दौरा महज एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि 2026 के विधानसभा चुनाव की पूरी रोडमैप तैयार करने का मिशन था। शाह ने साफ कहा कि यह चुनाव बीजेपी की राष्ट्रीय साख का इम्तिहान होगा। ममता बनर्जी का किला भेदना आसान नहीं, लेकिन शाह ने कार्यकर्ताओं को पांच मुख्य मंत्र सौंपे हैं घुसपैठ रोकना, भ्रष्टाचार उखाड़ना, हिंदुत्व की लहर फैलाना, सोनार बांग्ला का सपना बुनना और बंगाली विरासत को जिंदा करना। इन मुद्दों पर घूमती रहेगी बीजेपी की पूरी चुनावी मशीनरी।
शाह का कोलकाता दौरा 30 दिसंबर से शुरू हुआ, जब वे सीधे पार्टी मुख्यालय पहुंचे। वहां सांसदों, विधायकों और जिला अध्यक्षों के साथ बैठक हुई। उन्होंने हर बूथ पर नजर रखने का आदेश दिया। राज्य की 294 सीटों में से कम से कम दो-तिहाई, यानी 196 सीटें जीतने का टारगेट रखा। खासकर कोलकाता और उसके आसपास के 28 विधानसभा क्षेत्रों में से 22 पर कब्जा करने की बात कही। 2021 के चुनाव में बीजेपी को यहां एक भी सीट नसीब न हुई थी, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में हवा का रुख बदल गया। अब शाह का मानना है कि जमीनी स्तर पर संगठन मजबूत हो गया है। उन्होंने कार्यकर्ताओं से कहा, ‘हर घर तक पहुंचो, हर वोटर को बताओ कि ममता राज में बंगाल की मां-माटी-मानुष असुरक्षित हैं।’
घुसपैठ का मुद्दा शाह के एजेंडे का सबसे नुकीला हथियार है। उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस में चेतावनी दी कि अगर बीजेपी सत्ता में आई, तो एक-एक घुसपैठिए को चुन-चुनकर बाहर किया जाएगा। बांग्लादेश सीमा पर बाड़ लगाने के लिए जमीन न देने का आरोप लगाया ममता सरकार पर। कहा कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा का सवाल है, बंगाली अस्मिता का सवाल। शाह ने आंकड़े पेश किए- राज्य में लाखों अवैध प्रवासी बस चुके हैं, जो स्थानीय लोगों की नौकरियां और संसाधन छीन रहे हैं। कार्यकर्ताओं को निर्देश दिया कि गांव-गांव जाकर इस मुद्दे को गरम रखें। यह सिर्फ राजनीतिक चाल नहीं, बल्कि बंगाल के हिंदू वोटरों को एकजुट करने का प्लान है। 2021 में बीजेपी ने धार्मिक ध्रुवीकरण की कोशिश की थी, लेकिन ज्यादा सफलता न मिली। इस बार शाह इसे और तीखा बनाने पर तुले हैं। जय श्री राम और वंदे मातरम जैसे नारों को फिर से गूंजाने का ऐलान किया।
ममता बनर्जी ने इससे पलटवार में महाभारत के पात्रों का सहारा लिया। उन्होंने शाह को ‘शकुनि का चेला’ और बीजेपी को ‘दुर्योधन-दुशासन’ की संज्ञा दी। कहा कि जैसे ही चुनाव नजदीक आते हैं, ये लोग बंगाल में घुसपैठ का राग अलापने लगते हैं। ममता का दावा है कि उनकी सरकार ने सीमा सुरक्षा के लिए हर कदम उठाया है। लेकिन बीजेपी इसे कमजोरी के रूप में पेश कर रही है। शाह ने कहा, ‘ममता घुसपैठ नहीं रोक सकतीं, क्योंकि उनका वोट बैंक इसी पर टिका है।’ यह जुबानी जंग बंगाल की सड़कों पर उतर चुकी है। टीएमसी कार्यकर्ता बीजेपी के दावों को खारिज कर रहे हैं, जबकि बीजेपी के लोग इसे जनता का मूड बता रहे हैं।
संगठन को मजबूत करने पर शाह का पूरा जोर रहा। उन्होंने बिहार और झारखंड से अनुभवी नेताओं को बंगाल में तैनात करने का प्लान बनाया। हर जिले में बूथ प्रेजिडेंट्स की ट्रेनिंग का आदेश दिया। कहा कि 2021 में 77 सीटें जीतीं, 2024 में लोकसभा में 12 से बढ़कर 18 सीटें हासिल कीं। अब 2026 में ‘3 से 77’ का सफर पूरा कर दो-तिहाई बहुमत लाना है। शाह ने भ्रष्टाचार को दूसरा बड़ा मुद्दा बनाया। ममता सरकार पर भय का राज चलाने का आरोप लगाया। कहा कि गरीबों के लिए कुछ नहीं किया, सिर्फ कट-कमी की। सोनार बांग्ला का वादा किया- बीजेपी राज में बंगाल को आर्थिक हब बनाएंगे, रोजगार देंगे, विकास की नई इबारत लिखेंगे। बंगाली विरासत को पुनर्स्थापित करने की बात की, जैसे रवींद्रनाथ टैगोर की जयंती को बड़े स्तर पर मनाना।
लेकिन बीजेपी की राह में कांटे भरे पड़े हैं। राज्य में 30 फीसदी मुस्लिम वोटर हैं, जो पूरी तरह टीएमसी के साथ हैं। ये सौ से ज्यादा सीटों पर असर डालते हैं। पहले ये वोट लेफ्ट और कांग्रेस में बंटे थे, लेकिन 2011 से ममता ने इन्हें एकजुट कर लिया। बीजेपी का ध्रुवीकरण वाला फॉर्मूला यहां कमजोर पड़ता है, क्योंकि बंगाल में समाज सुधार आंदोलनों ने जाति-धर्म की दीवारें तोड़ दी हैं। भद्रलोक वर्ग, जो बंगाली बुद्धिजीवियों का प्रतिनिधित्व करता है, अभी भी टीएमसी की ओर झुका हुआ है। लेफ्ट और कांग्रेस का पतन बीजेपी के लिए फायदेमंद न साबित हुआ, क्योंकि उनका वोट शेयर टीएमसी में चला गया। 2016 से 2021 तक बीजेपी का वोट सिर्फ 1.5 फीसदी बढ़ा, जबकि टीएमसी को 3 फीसदी ज्यादा मिला।
ममता की लोकप्रियता अभी भी बरकरार है। वे देश की ताकतवर विपक्षी नेताओं में शुमार हैं। अरविंद केजरीवाल को दिल्ली में मात देने के बाद बीजेपी का हौसला बुलंद है, लेकिन बंगाल अलग चुनौती है। यहां बंगाली अस्मिता का कार्ड टीएमसी का सबसे मजबूत हथियार है। ममता ने बीजेपी को ‘बाहरी’ बताकर हमला बोला है। कहा कि ये लोग बंगाल की संस्कृति नहीं समझते। बीजेपी के पास ममता के कद का कोई चेहरा नहीं। शुभेंदु अधिकारी को आगे किया गया है, जो टीएमसी से आए हैं, लेकिन उनका प्रभाव पूरे राज्य में नहीं फैला। मूल बीजेपी नेताओं में इससे नाराजगी है। पार्टी सामूहिक नेतृत्व पर दांव खेल रही है, लेकिन क्या यह काफी होगा?
शाह ने कार्यकर्ताओं को एकजुटता का संदेश दिया। कहा कि आंतरिक कलह भूल जाओ, चुनाव जीतना है। उन्होंने 10 खास मंत्र दिए- हर बूथ पर विजय पताका फहराओ, वोटर लिस्ट साफ रखो, सोशल मीडिया पर सक्रिय रहो, हिंदू एकता पर जोर दो, विकास के आंकड़े गिनाओ। उनका दावा है कि जनता ममता के ‘भय और भ्रष्टाचार’ से तंग आ चुकी है। कोलकाता के कार्यकर्ता सम्मेलन में शाह ने कहा, ‘यह चुनाव निर्णायक होगा। बंगाल को बीजेपी का अभिन्न अंग बनाना है।’ ममता ने जवाब में कहा कि बीजेपी का ‘परिंदा भी पर नहीं मार सकेगा’। लेकिन सियासी हलचल तेज है। ग्रामीण इलाकों में बीजेपी की सभाएं बढ़ रही हैं, जबकि टीएमसी ने काउंटर रैली शुरू कर दी हैं।
2026 का चुनाव सिर्फ सीटों की जंग नहीं, बल्कि विचारधारा की टक्कर होगा। बीजेपी राष्ट्रीय सुरक्षा और हिंदुत्व पर दांव लगा रही है, जबकि टीएमसी बंगाली गौरव और कल्याण योजनाओं पर। शाह का दौरा बीजेपी को नई ऊर्जा दे गया है। अब सवाल यह है कि क्या ये मंत्र ममता के दुर्ग को हिला पाएंगे? बंगाल की जनता फैसला करेगी। फिलहाल, सियासी तापमान चढ़ता जा रहा है। नए साल की शुरुआत के साथ चुनावी बिगुल बज चुका है।



