मिशन 2027 की तैयारी में अखिलेश यादव सांसदों संग सपा की सत्ता वापसी रणनीति

लखनऊ में सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर सभी सांसदों के साथ अहम बैठक की. लोकसभा चुनाव में मिली सफलता के बाद पार्टी अब जमीनी रणनीति, संगठन की मजबूती, टिकट फॉर्मूला और PDA समीकरण के जरिए सत्ता में वापसी की तैयारी में जुट गई है.

अजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार

उत्तर प्रदेश की राजनीति में चुनावी साल अभी दूर है, लेकिन समाजवादी पार्टी ने यह मान लिया है कि सत्ता की लड़ाई आखिरी साल में नहीं, बल्कि उससे बहुत पहले लड़ी जाती है. लखनऊ में सपा प्रमुख अखिलेश यादव की ओर से बुलाई गई सांसदों की बैठक इसी सोच का नतीजा है. यह बैठक किसी औपचारिक चर्चा से ज्यादा, पार्टी के भविष्य का ब्लूप्रिंट मानी जा रही है. 2024 के लोकसभा चुनाव में मिले नतीजों ने सपा को जिस तरह से संजीवनी दी है, उसके बाद अखिलेश यादव अब एक भी मौका गंवाने के मूड में नहीं हैं. लोकसभा चुनाव 2024 में समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश की 80 में से 37 सीटों पर जीत दर्ज की. यह आंकड़ा इसलिए अहम है, क्योंकि 2019 में सपा सिर्फ 5 सीटों पर सिमट गई थी. पांच साल में यह उछाल सपा के लिए सिर्फ चुनावी जीत नहीं, बल्कि सियासी पुनर्जन्म जैसा है. पार्टी नेतृत्व का मानना है कि अगर यही सामाजिक समीकरण और संगठनात्मक ऊर्जा विधानसभा चुनाव में उतारी गई, तो सत्ता की दूरी कम की जा सकती है. यही वजह है कि अखिलेश यादव ने अपने सभी 37 लोकसभा और 4 राज्यसभा सांसदों को लखनऊ तलब किया.

इस बैठक में सबसे ज्यादा जोर जमीनी हकीकत पर दिया गया. अखिलेश यादव ने साफ कहा कि दिल्ली में संसद की राजनीति जरूरी है, लेकिन 2027 की लड़ाई गांव, कस्बे और बूथ पर लड़ी जाएगी. यूपी में एक लोकसभा क्षेत्र के तहत औसतन 5 विधानसभा सीटें आती हैं. इस हिसाब से सपा के सांसद करीब 185 विधानसभा सीटों पर सीधे तौर पर प्रभाव रखते हैं. पार्टी नेतृत्व अब इस प्रभाव को व्यवस्थित ताकत में बदलना चाहता है. सांसदों से कहा गया है कि वे अपने क्षेत्र की हर विधानसभा सीट की अलग-अलग रिपोर्ट दें, जिसमें संगठन की स्थिति, स्थानीय नेता, सामाजिक समीकरण और जनता की नाराजगी या समर्थन का पूरा ब्योरा हो.बैठक में यह भी साफ किया गया कि 2027 की तैयारी अब नारों के भरोसे नहीं चलेगी. सपा ने हर सांसद का एक आंतरिक रिपोर्ट कार्ड तैयार किया है. इसमें संसद में उपस्थिति, सवालों की संख्या, क्षेत्र में सक्रियता, कार्यकर्ताओं से संपर्क और संगठन के साथ तालमेल जैसे बिंदुओं को शामिल किया गया है. पार्टी सूत्रों का कहना है कि जिन सांसदों की जमीनी सक्रियता कमजोर पाई जाएगी, उन्हें चेतावनी दी जा सकती है या जिम्मेदारी घटाई भी जा सकती है. संदेश साफ है कि 2027 तक हर सांसद को फील्ड में दिखना होगा.

विशेष गहन संशोधन यानी SIR भी बैठक का अहम मुद्दा रहा. सपा का मानना है कि मतदाता सूची में गड़बड़ी चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकती है. यूपी में मतदाताओं की संख्या 12 करोड़ से ज्यादा है और हर विधानसभा सीट पर औसतन तीन लाख वोटर होते हैं. ऐसे में अगर हजारों नाम भी सूची से कटते या जुड़ते हैं, तो मुकाबले की दिशा बदल सकती है. अखिलेश यादव पहले ही सांसदों को जिलावार जिम्मेदारी देकर इस प्रक्रिया पर नजर रखने को कह चुके हैं. बैठक में सांसदों से पूछा गया कि उनके क्षेत्रों में SIR के दौरान क्या स्थिति है और किन इलाकों में शिकायतें आ रही हैं.सपा नेतृत्व का मानना है कि 2024 में मिली बढ़त के पीछे PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण की बड़ी भूमिका रही. यूपी की आबादी में पिछड़े वर्गों की हिस्सेदारी करीब 45 फीसदी, दलितों की करीब 21 फीसदी और अल्पसंख्यकों की करीब 19 फीसदी मानी जाती है. यह आंकड़े बताते हैं कि अगर इन वर्गों का बड़ा हिस्सा एकजुट होता है, तो सत्ता की तस्वीर बदल सकती है. अखिलेश यादव इसी सामाजिक गणित को और धार देने में जुटे हैं. बैठक में इस बात पर भी चर्चा हुई कि PDA के साथ-साथ उन वर्गों तक कैसे पहुंचा जाए, जो अब तक सपा से दूरी बनाए हुए हैं.

टिकट वितरण को लेकर भी इस बैठक के गहरे सियासी संकेत हैं. सपा इस बार उम्मीदवार चयन में कोई जल्दबाजी नहीं करना चाहती. पार्टी का फोकस अब ‘विनिंग कैंडिडेट’ पर है. जातीय समीकरण जरूर देखे जाएंगे, लेकिन सिर्फ जाति के नाम पर टिकट नहीं मिलेगा. जिस दावेदार की जमीनी पकड़ मजबूत होगी, जो संगठन से जुड़ा रहेगा और जनता के बीच सक्रिय होगा, वही आगे रहेगा. इसके लिए पार्टी ने सर्वे और फीडबैक सिस्टम तैयार किया है. हर विधानसभा सीट पर संभावित उम्मीदवारों की रिपोर्ट बनाई जा रही है, जिसमें उनकी लोकप्रियता, सामाजिक आधार और चुनाव जीतने की संभावना को परखा जा रहा है.बैठक में यह भी साफ किया गया कि सांसदों को सिर्फ अपने संसदीय क्षेत्र तक सीमित नहीं रहना है. उन्हें आसपास की विधानसभा सीटों पर भी संगठन मजबूत करने का जिम्मा दिया जा सकता है. इसका मकसद यह है कि चुनाव के वक्त पार्टी किसी एक चेहरे या क्षेत्र पर निर्भर न रहे. सपा नेतृत्व चाहता है कि हर इलाके में कम से कम दो-तीन मजबूत चेहरे तैयार हों, ताकि अंतिम वक्त में विकल्प मौजूद रहें.

बजट सत्र और सरकार को घेरने की रणनीति भी बैठक का हिस्सा रही. सांसदों को निर्देश दिए गए कि वे महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की समस्याएं, कानून-व्यवस्था और ग्रामीण विकास जैसे मुद्दों को लगातार उठाएं. सपा का मानना है कि अगर विधानसभा चुनाव से पहले जनता के रोजमर्रा के सवालों को मजबूती से उठाया गया, तो सरकार के खिलाफ माहौल बनाया जा सकता है. पार्टी इस बार विरोध को सिर्फ बयानबाजी तक सीमित नहीं रखना चाहती, बल्कि उसे जनआंदोलन का रूप देने की तैयारी है.अखिलेश यादव ने साफ कहा कि 2027 का चुनाव उनके लिए सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि सियासी साख की परीक्षा है. 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में हार के बाद सपा को सत्ता से दूर हुए एक दशक से ज्यादा हो चुका होगा. ऐसे में पार्टी नेतृत्व जानता है कि यह मौका हाथ से गया, तो आगे की राह और मुश्किल हो सकती है. इसी सोच के साथ संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने का लक्ष्य तय किया गया है.कुल मिलाकर, लखनऊ में हुई यह बैठक समाजवादी पार्टी के लिए सिर्फ एक रणनीतिक बैठक नहीं, बल्कि एक नए दौर की शुरुआत है. सपा अब भावनाओं से ज्यादा आंकड़ों, सर्वे और जमीनी फीडबैक पर भरोसा कर रही है. सांसदों को जवाबदेह बनाकर पार्टी नेतृत्व यह संदेश देना चाहता है कि 2027 की लड़ाई सामूहिक जिम्मेदारी है. अखिलेश यादव की यह पहल बताती है कि सपा अब इंतजार की राजनीति छोड़कर, पूरी ताकत के साथ सत्ता की बिसात बिछाने में जुट चुकी है.

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