माघी मेले से बजा 2027 का बिगुल, पंजाब में सत्ता की जंग ने पकड़ी रफ्तार

पंजाब का माघी मेला 2027 विधानसभा चुनाव की पहली राजनीतिक जंग का मंच बन गया। AAP, बीजेपी और अकाली दल ने यहां अपनी ताकत दिखाई। धार्मिक आयोजन के बीच सियासत गरम, ग्रामीण और शहरों में रणनीतियां तेज। 2027 की लड़ाई लंबी और चुनौतीपूर्ण होने वाली है।

पंजाब में विधानसभा चुनाव भले ही अभी डेढ़ साल दूर हों, लेकिन सियासी सरगर्मी ने वक्त से पहले ही रफ्तार पकड़ ली है। श्री मुक्तसर साहिब में हर साल 14 जनवरी को लगने वाला माघी मेला इस बार महज धार्मिक आयोजन नहीं रहा, बल्कि 2027 की चुनावी जंग का पहला बड़ा मंच बनकर उभरा। आम आदमी पार्टी, भारतीय जनता पार्टी और शिरोमणि अकाली दल तीनों ने इसी मेले के जरिए अपनी राजनीतिक मौजूदगी दर्ज कराई और साफ कर दिया कि आने वाला चुनाव आसान नहीं होने वाला। माघी मेले का ऐतिहासिक महत्व सिख समाज के लिए गहरा है। 1705 में मुगलों के खिलाफ खिदराना की लड़ाई में शहीद हुए चाली मुक्तों की स्मृति में आयोजित यह मेला पंजाब का सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन माना जाता है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक हर साल इस मेले में 8 से 10 लाख श्रद्धालु पहुंचते हैं। इतनी बड़ी संख्या में ग्रामीण और कस्बाई आबादी की मौजूदगी ने इसे राजनीतिक दलों के लिए बेहद अहम बना दिया है। यही वजह है कि पिछले कुछ वर्षों से माघी मेला सियासी सम्मेलन का केंद्र बनता जा रहा है।

इस बार सबसे ज्यादा सक्रियता आम आदमी पार्टी की दिखी। दिल्ली में सत्ता गंवाने के बाद पार्टी का पूरा फोकस पंजाब पर है, जहां वह इस समय सरकार में है। पार्टी नेतृत्व किसी भी हाल में 2027 में सत्ता दोहराने के मूड में नजर आ रहा है। मुख्यमंत्री भगवंत मान खुद माघी मेले में पहुंचे और मंच से अपनी सरकार के चार साल के कामकाज का लेखा-जोखा रखा। शिक्षा, स्वास्थ्य और बिजली सब्सिडी को पार्टी ने अपनी बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश किया। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पंजाब में अब तक 800 से ज्यादा सरकारी स्कूलों को ‘स्कूल ऑफ एमिनेंस’ के तौर पर अपग्रेड किया जा चुका है, जबकि 600 से ज्यादा आम आदमी क्लीनिक काम कर रहे हैं।AAP की रणनीति सिर्फ मंच से भाषण देने तक सीमित नहीं रही। पार्टी ने माघी मेले के दौरान लगभग 20 से 25 एकड़ क्षेत्र में अपने समर्थकों के लिए इंतजाम किए। पार्टी नेताओं का दावा रहा कि सम्मेलन में 60 हजार से ज्यादा कार्यकर्ता और समर्थक पहुंचे। यह वही माघी मेला है, जहां 2016 में अरविंद केजरीवाल ने पहली बार पंजाब में बड़े स्तर पर राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन किया था और 2017 के चुनाव अभियान का आगाज किया था। करीब दस साल बाद पार्टी ने फिर से उसी जमीन से मिशन-2027 की शुरुआत की है।

हालांकि आम आदमी पार्टी के लिए यह मेला पूरी तरह सहज भी नहीं रहा। सिखों की सर्वोच्च धार्मिक संस्था अकाल तख्त के जत्थेदार ने मुख्यमंत्री भगवंत मान को कथित सिख विरोधी टिप्पणियों के मामले में तलब किया है। ऐसे में AAP के लिए धार्मिक और राजनीतिक संतुलन बनाए रखना बड़ी चुनौती बनकर सामने आया है।दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी ने इस बार माघी मेले में अलग ही संदेश दिया। शिरोमणि अकाली दल से गठबंधन टूटने के पांच साल बाद बीजेपी ने पहली बार माघी मेले में अपना स्वतंत्र राजनीतिक सम्मेलन किया। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सुनील जाखड़ के नेतृत्व में बीजेपी नेताओं ने साफ कहा कि पार्टी अब सिर्फ शहरी इलाकों तक सीमित नहीं रहना चाहती। बीजेपी का फोकस ग्रामीण पंजाब पर है, जहां अब तक उसका जनाधार कमजोर माना जाता रहा है।

बीजेपी की यह रणनीति अचानक नहीं है। 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को 117 में से सिर्फ 2 सीटें मिली थीं और वोट शेयर करीब 6 फीसदी रहा था। इसके बावजूद पार्टी ने हाल के नगर निगम और स्थानीय निकाय चुनावों में कुछ इलाकों में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है। बीजेपी नेतृत्व मानता है कि अकेले चुनाव लड़कर और सिख धार्मिक आयोजनों में सक्रिय भूमिका निभाकर वह धीरे-धीरे अपनी स्वीकार्यता बढ़ा सकती है। माघी मेले में किया गया सम्मेलन इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।बीजेपी का यह कदम अकाली दल के लिए भी सियासी संकेत लेकर आया। दशकों तक माघी मेले में अकाली दल का दबदबा रहा है। पहले यही पार्टी यहां अपना बड़ा सम्मेलन करती थी और बीजेपी उसके सहयोगी के तौर पर मंच साझा करती थी। लेकिन इस बार समीकरण बदले नजर आए। शिरोमणि अकाली दल ने भी माघी मेले के दौरान अपने कार्यक्रम रखे और कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा भरने की कोशिश की।

अकाली दल पिछले दस साल से सत्ता से बाहर है। 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा। हालांकि हाल के जिला परिषद और पंचायत समिति चुनावों में पार्टी के प्रदर्शन ने उसे कुछ राहत दी है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक अकाली दल ने इन चुनावों में तीन जिला परिषदों में बहुमत हासिल किया और कुल मिलाकर 20 फीसदी से ज्यादा सीटें जीतीं। पार्टी इसे अपने पुनरुत्थान की शुरुआत मान रही है। सुखबीर सिंह बादल ने माघी मेले के दौरान साफ कहा कि 2027 में अकाली दल की वापसी तय है।कांग्रेस भले ही माघी मेले में बड़े मंच के साथ नजर न आई हो, लेकिन पार्टी भी सियासी दौड़ में पीछे नहीं है। 2022 में सत्ता गंवाने के बाद कांग्रेस संगठन को दोबारा खड़ा करने में जुटी है। पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर भले ही मतभेद हों, लेकिन जमीनी स्तर पर कांग्रेस किसानों, दलितों और ग्रामीण मुद्दों को लेकर सक्रिय बताई जा रही है। पार्टी नेताओं का दावा है कि बेरोजगारी, नशा और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दे 2027 में बड़ा चुनावी हथियार बनेंगे।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि माघी मेले से साफ हो गया है कि 2027 का चुनाव त्रिकोणीय या चतुष्कोणीय मुकाबले की ओर बढ़ रहा है। आम आदमी पार्टी सत्ता में होने के फायदे और नुकसान दोनों के साथ मैदान में होगी। बीजेपी नए सिरे से अपनी जमीन तलाशने में जुटी है, जबकि अकाली दल अपनी खोई हुई पहचान वापस पाने की कोशिश कर रहा है। कांग्रेस भी मौके की तलाश में है।धार्मिक आयोजन के बहाने राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन ने यह भी दिखा दिया है कि पंजाब की राजनीति में सांस्कृतिक और धार्मिक प्रतीकों की भूमिका आने वाले समय में और बढ़ेगी। माघी मेले से शुरू हुई यह सियासी हलचल अब गांव-गांव और कस्बे-कस्बे तक पहुंचेगी। साफ है कि 2027 की लड़ाई लंबी है, लेकिन पहला बिगुल श्री मुक्तसर साहिब की धरती से बज चुका है।

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