तमिलनाडु की राजनीति में कांग्रेस‑डीएमके गठबंधन सत्ता, हिस्सेदारी और 2026 का नया समीकरण
तमिलनाडु में 2026 विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस‑डीएमके गठबंधन की राजनीति, सीटों का बंटवारा, सत्ता में हिस्सेदारी और पहचान की जंग। कांग्रेस अपनी भूमिका मजबूत करना चाहती है, जबकि डीएमके पुराने सिद्धांतों के साथ सत्ता की कुंजी अपने पास रखना चाहता है। चुनाव भविष्य के राजनीतिक समीकरण तय करेगा।


तमिलनाडु की राजनीति हमेशा से ही भारत में गठबंधन की जटिल परतों का उदाहरण रही है, और 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले यह परतें और गहरी होती दिख रही हैं। यहां सत्तारूढ़ द्रविड़ मुनेत्र कझगम (डीएमके) और कांग्रेस का गठबंधन एक ऐसा राजनीतिक समीकरण बन चुका है जिसमें दोनों पक्षों की मजबूरियां, आकांक्षाएं और ऐतिहासिक विरोधाभास एक साथ नजर आते हैं। कांग्रेस लंबे समय से डीएमके के साथ गठबंधन करती आ रही है, लेकिन राज्य में उसकी स्थिति एक जूनियर साझेदार से अधिक कभी नहीं रही। इस बार कांग्रेस केवल सीटों की संख्या नहीं, बल्कि सरकार में हिस्सेदारी की भी मांग कर रही है।कांग्रेस हाईकमान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में उसका गठबंधन केवल डीएमके के साथ होगा। राज्य के कुछ नेताओं की ओर से विजय की नई पार्टी तमिलागा वेत्रि कझगम (TVK) के साथ चुनावी तालमेल की बातें उठ रही थीं, लेकिन हाईकमान ने इस पहल को फिलहाल खारिज कर दिया है। यह निर्णय दर्शाता है कि कांग्रेस अपने लंबे समय के भरोसेमंद सहयोगी के साथ ही चुनाव लड़ने में विश्वास रखती है और किसी नए राजनीतिक प्रयोग का जोखिम नहीं उठाना चाहती।
इस बार कांग्रेस ने डीएमके से सीटों के बंटवारे पर भी अधिक दबाव बनाया है। पार्टी 40-45 सीटों की मांग कर रही है, जबकि डीएमके ने फिलहाल 32 सीटों की पेशकश की है। पिछली बार 2021 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को केवल 25 सीटें दी गई थीं, जिनमें से उसने 17 सीटों पर जीत दर्ज की थी। इस अनुभव से कांग्रेस का मानना है कि डीएमके के साथ तालमेल जारी रखते हुए भी उसे अपनी स्थिति मजबूत करनी होगी और केवल वोट ट्रांसफर मशीन बनने की भूमिका स्वीकार नहीं करनी चाहिए।तमिलनाडु की राजनीति में यह बात किसी से छिपी नहीं कि डीएमके ने हमेशा राष्ट्रीय दलों को राज्य में सत्ता की मुख्य कुंजी से दूर रखा है। 1967 के चुनाव के बाद से लेकर आज तक डीएमके ने यह सुनिश्चित किया है कि राष्ट्रीय दल केवल गठबंधन का हिस्सा बनें, लेकिन राज्य की सत्ता में असली निर्णय लेने की शक्ति उसके हाथ में रहे। यही कारण है कि कांग्रेस तमिलनाडु में हमेशा जूनियर पार्टनर की भूमिका में रही है, जबकि उत्तर भारत के कई राज्यों में वह क्षेत्रीय दलों के साथ सत्ता साझा कर सकती थी।
कांग्रेस के भीतर यह बेचैनी लंबे समय से रही है। पार्टी के कार्यकर्ता और नेता देखते हैं कि उत्तर भारत में कांग्रेस क्षेत्रीय दलों के साथ सत्ता साझा करती है, लेकिन तमिलनाडु में वह केवल समर्थन देने तक सीमित है। यही वजह है कि इस बार कांग्रेस हाईकमान के जरिए डीएमके से सिर्फ सीटें नहीं, बल्कि सरकार में हिस्सेदारी की गारंटी भी मांग रही है।दूसरी ओर, डीएमके के लिए यह चुनौती आसान नहीं है। स्टालिन की अगुवाई वाली पार्टी जानती है कि अगर उसने कांग्रेस को सत्ता में बराबरी का हिस्सा दे दिया, तो यह राज्य में अन्य राष्ट्रीय दलों के लिए भी दरवाजा खोलने जैसा होगा। डीएमके का यह ऐतिहासिक दृष्टिकोण 1967 से विकसित हुआ है, जब उसने कांग्रेस को राज्य की सत्ता से बाहर कर दिया और बाद में गठबंधन करते हुए भी उसे मुख्य सत्ता में शामिल नहीं होने दिया।2026 का चुनाव सिर्फ कांग्रेस और डीएमके का सवाल नहीं है। AIADMK और BJP का गठबंधन भी राज्य की राजनीति में एक मजबूत चुनौती के रूप में सामने है। AIADMK का मानना है कि वह भाजपा के साथ गठबंधन करके सत्ता की कुंजी हासिल कर सकता है, लेकिन यह भी सुनिश्चित कर रहा है कि भाजपा राज्य सरकार में मुख्य भूमिका में न आए। ऐसे में तमिलनाडु की राजनीति एक बार फिर राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों के बीच संतुलन बनाने के संघर्ष का मंच बन रही है।
कांग्रेस के लिए यह चुनाव पहचान और अस्तित्व की लड़ाई भी है। पार्टी अब सिर्फ सहयोगी के रूप में नहीं रहना चाहती, बल्कि वह राज्य में अपनी सशक्त भूमिका स्थापित करना चाहती है। हाईकमान ने यह संकेत दिया है कि गठबंधन में कोई बदलाव फिलहाल नहीं होगा, लेकिन सीट बंटवारे और हिस्सेदारी पर बातचीत जारी है। कांग्रेस के नेताओं का मानना है कि डीएमके के साथ तालमेल से ही वह अपने राजनीतिक हित और लोकसभा सीटों की सुरक्षा कर सकती है।राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि 2026 के चुनाव में कांग्रेस‑डीएमके गठबंधन सिर्फ चुनावी तालमेल नहीं होगा, बल्कि यह तय करेगा कि तमिलनाडु की राजनीति में राष्ट्रीय दलों की भूमिका कितनी प्रभावशाली होगी। कांग्रेस के अंदर इस बार स्पष्ट संदेश है कि वह जूनियर पार्टनर की भूमिका स्वीकार नहीं करेगी और अगर आवश्यकता पड़ी, तो गठबंधन में हिस्सेदारी के लिए अपनी सियासी ताकत दिखाएगी।डीएमके के लिए भी यह चुनौती है कि वह अपने ऐतिहासिक दृष्टिकोण को बनाए रखते हुए कांग्रेस को संतुष्ट करे। स्टालिन और उनके नेताओं के सामने यह सवाल है कि क्या वे अपने पिता की विरासत को कायम रखते हुए राष्ट्रीय दलों को सीमित सत्ता में ही शामिल करेंगे या कांग्रेस की मांग के अनुसार हिस्सेदारी देंगे।
सत्ता, हिस्सेदारी और पहचान का यह मिश्रण तमिलनाडु की राजनीति को 2026 में बेहद दिलचस्प बना रहा है। कांग्रेस‑डीएमके गठबंधन का परिणाम राज्य की जनता और चुनावी समीकरणों पर सीधे असर डालेगा। चुनाव सिर्फ विचारधारा का संघर्ष नहीं होगा, बल्कि यह दिखाएगा कि राजनीतिक मजबूरियां और रणनीति किस तरह सत्ता और पहचान तय करती हैं।इस बार चुनाव में कांग्रेस का जोर केवल सीटों पर नहीं, बल्कि सत्ता में हिस्सेदारी की मांग पर है। डीएमके के लिए यह देखना चुनौतीपूर्ण होगा कि वह अपनी सियासी मजबूरी और रणनीति के बीच संतुलन बनाए रख सके। तमिलनाडु का 2026 चुनाव न केवल गठबंधनों की राजनीति, बल्कि राज्य में राष्ट्रीय दलों की पहचान और हिस्सेदारी की लड़ाई का नया अध्याय लिखने जा रहा है।राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह चुनाव तय करेगा कि क्या कांग्रेस अपनी पुरानी जूनियर पार्टनर की भूमिका को छोड़कर राज्य में प्रभावशाली भूमिका निभा पाएगी या फिर डीएमके के ऐतिहासिक दृष्टिकोण के तहत केवल समर्थन देने तक ही सीमित रहेगी। इस चुनाव में दोनों दलों की रणनीति, राजनीतिक मजबूरियां और जनता की धारणा निर्णायक भूमिका निभाएगी।इस तरह, 2026 का तमिलनाडु विधानसभा चुनाव केवल एक चुनाव नहीं, बल्कि राजनीतिक पहचान, सत्ता की हिस्सेदारी और गठबंधन की नई परतों का संगम होगा, जो राज्य की राजनीति के भविष्य की दिशा तय करेगा।



