कर्नाटक सर्वे से कांग्रेस को झटका, मतदाताओं ने चुनाव और ईवीएम पर भरोसा जताया

कर्नाटक सर्वे में 91% मतदाताओं ने चुनाव को स्वतंत्र और निष्पक्ष माना, जबकि 83.61% ने ईवीएम पर भरोसा जताया। यह सर्वे राहुल गांधी और कांग्रेस के “वोट चोरी” दावों के लिए चुनौती पेश करता है, जनता के लोकतंत्र और चुनाव प्रक्रिया पर मजबूत विश्वास को उजागर करता है।

अजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार

2026 की शुरुआत में एक राज्य‑स्तरीय सर्वे ने देश की राजनीतिक दिशा पर बड़ा असर डाला है। जनता के जन विश्वास और लोकतंत्र की विश्वसनीयता को लेकर उठ रहे सवालों के बीच जब कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी पूर्व में कई मौकों पर “वोट चोरी” और ईवीएम में गड़बड़ी जैसे आरोपों के जरिए केंद्र की भाजपा सरकार तथा चुनाव आयोग पर हमला बोलते रहे, उसी वक्त कर्नाटक सरकार के आधिकारिक सर्वे ने एक नई तस्वीर उभरकर रख दी है। यह सर्वे कर्नाटक निगरानी और मूल्यांकन प्राधिकरण (KMEA) द्वारा कराए गए अध्ययन पर आधारित है जिसे कर्नाटक सरकार ने आधिकारिक तौर पर जारी किया है। सर्वे के नतीजों में 91.31 प्रतिशत लोगों ने कहा कि भारत में चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से होते हैं, और 83.61 प्रतिशत लोगों का कहना है कि ईवीएम पर भरोसा करते हैं, जो राजनीतिक बहस को एक नई दिशा देता है। यह सर्वे सिर्फ राजनीतिक बयान नहीं बल्कि आंकड़ों पर आधारित अध्ययन है। इसमें कर्नाटक के 102 विधानसभा क्षेत्रों के 5,100 से अधिक मतदाताओं से व्यापक स्तर पर बातचीत की गयी। सर्वे में बेंगलुरु, बेलगावी, कलबुर्गी और मैसूरु जैसे डिवीजनों को शामिल किया गया, ताकि राज्य के विभिन्न क्षेत्रों के मतदाताओं की राय का संतुलित विश्लेषण मिल सके। इन आंकड़ों के प्रकाश में यह साफ दिखता है कि कर्नाटक में मतदाताओं का लोकतंत्र और चुनावी प्रणाली पर गहरा भरोसा है, खासकर ईवीएम की निष्पक्षता पर, जो आज राजनीतिक बहस का मुख्य मुद्दा बन रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों के हिसाब से यह सर्वे कांग्रेस के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है, क्योंकि पार्टी लंबे समय से ईवीएम पर सवाल उठाकर “वोट चोरी” का मुद्दा केंद्र सरकार और चुनाव आयोग के खिलाफ केंद्रित करती रही है। राहुल गांधी ने हाल के चुनावों के समय ही चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए दावा किया था कि ईवीएम वोटर्स की आज़ादी को प्रभावित करती है और गड़बड़ी की आशंका बढ़ाती है। हालांकि, कर्नाटक सर्वे के अनुसार जनता के बीच इस दावे के लिए कोई मजबूत आधार नहीं दिखता है।सर्वे के परिणामों की प्रमुख विशेषता यह है कि 84.55 प्रतिशत लोगों ने माना कि भारत में चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से होते हैं। खास बात यह है कि कर्नाटक के कलबुर्गी डिवीजन में यह भरोसा सबसे अधिक देखा गया जहां 84.67 प्रतिशत मतदाताओं ने चुनाव की निष्पक्षता पर सहमति जताई। यह आंकड़ा इसलिए भी उल्लेखनीय है क्योंकि कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का नाता इसी क्षेत्र से है। जनता के इस व्यापक विश्वास ने यह संकेत दिया है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया के प्रति मतदाताओं की सकारात्मक धारणा मजबूत बनी हुई है।

सर्वे के आंकड़ों के अनुसार 83.61 प्रतिशत लोगों ने ईवीएम पर भरोसा जताया, जो यह दर्शाता है कि चुनाव मशीनरी और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग प्रणाली को लेकर मतदाताओं में व्यापक संतोष है। दिल्ली से राहुल गांधी द्वारा उठाया गया यह मुद्दा कि ईवीएम समस्याग्रस्त हो सकती हैं और परिणामों की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर सकती हैं, को जनता का समर्थन मिला हुआ नहीं दिखता है। कर्नाटक के मतदाताओं ने खुद को लोकतंत्र के आधारभूत स्तंभ, यानी निष्पक्ष चुनाव पर भरोसा जताने में गुरेज नहीं किया है। इस सर्वे का असर राजनीतिक गठबंधनों और आगामी विधानसभा चुनावों पर भी देखा जा रहा है। भाजपा ने इस सर्वे के आंकड़ों को कांग्रेस के “वोट चोरी” दावे के खिलाफ एक निर्णायक प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया है। कर्नाटक भाजपा ने सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर लिखा कि “राहुल गांधी ने दिल्ली में वोट चोरी रैली का बड़ा ड्रामा किया, लेकिन कर्नाटक सरकार के अपने सर्वे ने सिद्ध कर दिया कि 83.61 प्रतिशत कर्नाटक के मतदाता EVM पर भरोसा करते हैं।” भाजपा ने यह भी आरोप लगाया कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता बिना किसी प्रमाण के चुनाव में गड़बड़ी के आरोप लगा रहे हैं और जनता अब इसे समझ चुकी है।

भाजपा ने तीन प्रमुख बिंदुओं में कांग्रेस को घेरा है  पहला, राहुल गांधी द्वारा वोट चोरी का आरोप लगाने पर यह साबित हुआ कि जनता ईवीएम और लोकतंत्र पर यकीन रखती है। दूसरा, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार जैसे नेताओं द्वारा बिना ठोस सुबूत के आरोप लगाना; और तीसरा, कांग्रेस के कुछ सदस्यों द्वारा तथ्यों को गलत तरीके से पेश करने की घटनाएँ, जो जनता का विश्वास कमजोर कर सकती हैं। भाजपा का कहना है कि अब कांग्रेस को अपने रणनीतिक मुद्दों पर दोबारा विचार करना पड़ेगा क्योंकि जनता का ध्यान आज लोकतंत्र की विश्वसनीयता पर अधिक केंद्रित है।वहीं, कांग्रेस की प्रतिक्रिया साफ है कि यह सर्वे कांग्रेस की बहस को कमजोर नहीं कर सकता। पार्टी का कहना है कि चुनाव प्रक्रिया और ईवीएम समेत अन्य चुनावी मुद्दों पर सवाल उठाना लोकतंत्र का हिस्सा है, और यह जरूरी है कि चुनाव आयोग और सरकार पूरी तरह पारदर्शिता के साथ प्रक्रिया को आगे बढ़ाएं। कांग्रेस का कहना है कि यह सर्वे एक राज्य‑विशेष का अध्ययन है और इसे राष्ट्रव्यापी निष्कर्ष के रूप में नहीं लिया जा सकता। पार्टी यह भी आरोप लगाती है कि भाजपा इस सर्वे के आंकड़ों का राजनीतिक रूप से दुरुपयोग कर रही है।

राजनीतिक समीक्षक मानते हैं कि यह सर्वे भाजपा के पक्ष में तर्क को मजबूत करता है कि भारत में चुनाव की प्रक्रिया पर मतदाताओं का भरोसा उच्च स्तर पर है। यदि कोई नरेटिव जनता के भरोसे के विपरीत होता तो उस पर बहस लोकतांत्रिक रूप से संभव होती, परन्तु सर्वे की व्यापक सहमति ने यह संकेत दिया है कि जनता लोकतंत्र, चुनाव आयोग और ईवीएम प्रणाली पर भरोसा रखती है।कुल मिलाकर, यह सर्वे 2026 के विधानसभा चुनावों के साये में राजनीतिक रणनीतियों और मुद्दों को फिर से परिभाषित कर रहा है। राहुल गांधी और कांग्रेस के लिए यह चुनौती बनी हुई है कि वे नए मुद्दों की खोज करें जो सीधे जनता के रोज़मर्रा के अनुभवों और विश्वास पर आधारित हों, न कि केवल चुनावी प्रक्रियाओं पर सवाल उठाने तक सीमित रहें। वहीं भाजपा के लिए यह आंकड़े 2026‑27 के चुनावी माहौल में अपनी साख को मजबूत करने का जरिया बन सकते हैं।इस सर्वे ने साबित कर दिया कि जनता आज भी लोकतंत्र, चुनाव प्रक्रिया और ईवीएम पर भरोसा करती है, और राजनीतिक बहस उसी धरातल पर होगी जिस पर जनता खड़ी दिख रही है  पारदर्शिता, निष्पक्षता और लोकतांत्रिक अपेक्षाएँ।

Related Articles

Back to top button