सतुआ बाबा रोटी वीडियो बना योगी–केशव तनाव का प्रतीक, यूपी सत्ता संतुलन पर सवाल

प्रयागराज का रोटी वीडियो यूपी राजनीति में प्रशासन, आस्था और सत्ता संतुलन की बहस बन गया। डीएम का सतुआ बाबा के लिए रोटी बनाना, केशव मौर्य की टिप्पणी और माघ मेला अव्यवस्था ने योगी-केशव तनाव, भाजपा के भीतर संगठन-सरकार रिश्ते और सोशल मीडिया की राजनीतिक ताकत को उजागर किया। साथ ही प्रशासनिक प्राथमिकताओं पर सवाल

अजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार

उत्तर प्रदेश की राजनीति में प्रयागराज से आए एक वायरल वीडियो ने पूरी सियासी परिदृश्य को हिला कर रख दिया है। इस वीडियो में जिलाधिकारी मनीष कुमार वर्मा को चूल्हे पर बैठकर सतुआ बाबा के लिए रोटी बनाते हुए देखा गया, जो सामान्य प्रशासनिक व्यवहार से बिल्कुल अलग था। यह वीडियो सोशल मीडिया पर आते ही तेज़ी से वायरल हो गया और राजनीति, प्रशासन और जनता के बीच कई बहसों को जन्म दे गया। इस घटना ने न केवल अधिकारियों की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़ा किया, बल्कि उत्तर प्रदेश की सत्ताधारी भाजपा के भीतर चल रही शक्तियों के संतुलन और सत्ता संघर्ष को भी उजागर किया। घटना की शुरुआत तब हुई जब उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य माघ मेले की तैयारियों का औचक निरीक्षण करने प्रयागराज पहुंचे। माघ मेला उत्तर प्रदेश का एक विशाल धार्मिक आयोजन है, जिसमें लाखों की संख्या में श्रद्धालु संगम में डुबकी लगाते हैं। प्रशासन के लिए यह आयोजन चुनौतीपूर्ण होता है क्योंकि इसे सुचारू रूप से संचालित करने के लिए हर विभाग की तत्परता आवश्यक होती है। लेकिन निरीक्षण के दौरान मौर्य ने पाया कि तैयारियों में कई खामियाँ थीं और जो व्यवस्थाएँ संतों और श्रद्धालुओं के लिए बताई जा रही थीं, वे धरातल पर उतनी प्रभावी नहीं थीं। इसी बीच उन्होंने जिलाधिकारी मनीष वर्मा को बुलाया और हँसते हुए कहा कि ‘सतुआ बाबा की रोटी के चक्कर में मत पड़ो’, जिससे प्रशासनिक प्राथमिकताओं पर ध्यान देने का संदेश गया।

वीडियो के वायरल होते ही सोशल मीडिया पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएँ आईं। कुछ लोगों ने डीएम के इस व्यवहार की तारीफ की क्योंकि उन्होंने एक धार्मिक-सामाजिक व्यक्ति के प्रति आदर दिखाया, तो वहीं कई लोगों ने इसे प्रशासनिक अनुशासन की कमी और प्राथमिकताओं में गड़बड़ी बताया। विशेषज्ञों के अनुसार, इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया कि प्रशासनिक अधिकारी और राजनीतिक नेतृत्व के बीच संतुलन बनाए रखना कितना महत्वपूर्ण है। सतुआ बाबा स्वयं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के करीबी धार्मिक-सामाजिक नेता माने जाते हैं। पिछले कुंभ मेले और अन्य धार्मिक अवसरों पर उनका नाम मुख्यमंत्री के साथ जुड़ा रहा है। सतुआ बाबा विष्णुस्वामी संप्रदाय के प्रमुख हैं और उन्हें जगतगुरू की पदवी भी मिली है। उनके धार्मिक और सामाजिक प्रभाव के कारण यह घटना और अधिक संवेदनशील हो गई। यही कारण है कि माघ मेले की तैयारियों के दौरान डीएम का इस तरह का व्यवहार राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया।राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इस वायरल वीडियो ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नई बहस को जन्म दिया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के बीच समय-समय पर संगठन और सरकार के बीच मतभेद के संकेत मिलते रहे हैं। 2017 में जब योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाया गया, तब केशव प्रसाद मौर्य खुद मुख्यमंत्री पद के दावेदार थे। हालांकि उन्हें उपमुख्यमंत्री बनाया गया, लेकिन उनके कुछ बड़े विभागों को बाद में अलग कर दिया गया। यही कारण है कि दोनों नेताओं के बीच सत्ता, संगठन और जातीय संतुलन को लेकर सूक्ष्म मतभेद दिखाई देते रहे हैं।

2018-2019 में विभागीय नियुक्तियों और PWD टेंडर को लेकर दोनों नेताओं के बीच चिट्ठियों और आरोप-प्रत्यारोप का दौर चला। 2024 लोकसभा चुनाव में भाजपा को 29 सीटें गंवानी पड़ीं, उसके बाद केशव मौर्य के एक बयान ने योगी सरकार पर अप्रत्यक्ष हमला जैसा प्रतीत हुआ। मौर्य ने कहा था कि ‘संगठन सरकार से बड़ा है’, जिसे राजनीतिक विश्लेषकों ने दोनों नेताओं के बीच तनाव बढ़ाने वाला माना। इसके अलावा अयोध्या दीपोत्सव में विज्ञापन में नाम न छपने पर केशव और ब्रजेश उपमुख्यमंत्री कार्यक्रम में शामिल नहीं हुए। ऐसे संकेत स्पष्ट करते हैं कि दोनों नेताओं के बीच कोई पूर्ण युद्ध नहीं है, लेकिन अलग-अलग स्तर पर मतभेद मौजूद हैं।इस पूरे प्रकरण ने प्रशासनिक व्यवहार और राजनीतिक संकेतों के बीच के अंतर को उजागर किया है। जब किसी अधिकारी का कामकाज धार्मिक-सामाजिक हस्तियों के साथ जुड़ जाता है और वह वायरल हो जाता है, तो यह सिर्फ एक वीडियो नहीं रह जाता। यह प्रशासनिक प्राथमिकताओं, राजनीतिक संदेश और मीडिया में प्रतिध्वनि का एक केंद्र बन जाता है। प्रयागराज के इस वीडियो ने साफ़ कर दिया कि छोटे-छोटे दृश्य भी बड़ी राजनीतिक बहस का कारण बन सकते हैं।सोशल मीडिया पर इस वीडियो ने दो प्रकार की प्रतिक्रियाएँ पैदा की हैं। एक तरफ ऐसे लोग हैं जो डीएम के इस कार्य को श्रद्धा और भक्ति के प्रतीक के रूप में देख रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ आलोचक इसे प्रशासनिक अनुशासन की कमी और प्राथमिकताओं में गड़बड़ी मान रहे हैं। राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, यह घटना उत्तर प्रदेश की सत्ताधारी भाजपा में संगठन और सरकार के बीच सत्ता संतुलन को दर्शाती है। ऐसे संकेत आगामी चुनावी रणनीतियों और संगठनात्मक निर्णयों पर प्रभाव डाल सकते हैं।

माघ मेले के दौरान वीडियो के वायरल होने के बाद प्रशासनिक अधिकारियों की जिम्मेदारी और उनके कामकाज की प्राथमिकता पर सवाल उठना स्वाभाविक था। प्रशासनिक दृष्टि से देखें तो लाखों लोगों की सुरक्षा और सुविधा सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण होता है। ऐसे समय में डीएम का रोटी बनाना प्रशासनिक प्राथमिकताओं से ध्यान हटाने जैसा प्रतीत हुआ। हालांकि, राजनीतिक और सामाजिक दृष्टिकोण से यह एक प्रतीकात्मक घटना बन गई।इस वायरल वीडियो ने यह भी साबित किया कि आजकल की राजनीति में सोशल मीडिया का प्रभाव कितना बड़ा है। छोटे से दृश्य ने प्रशासनिक कामकाज, धार्मिक आस्था और राजनीतिक संतुलन को जोड़कर व्यापक बहस छेड़ दी। अब यह घटना सिर्फ एक प्रशासनिक गतिविधि नहीं रह गई, बल्कि यह उत्तर प्रदेश की राजनीति में सत्ता, संगठन और प्रशासन के बीच के सूक्ष्म तनाव का प्रतीक बन गई है।भाजपा विरोधियों ने भी इस घटना का राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश की। उनका कहना है कि यह संकेत देता है कि पार्टी के भीतर शीत युद्ध चल रहा है और संगठन तथा सरकार के बीच संतुलन पर सवाल उठता है। वहीं समर्थक इसे प्रशासनिक चेतावनी और प्राथमिकताओं को ध्यान में रखने के संदेश के रूप में देख रहे हैं। यह स्पष्ट है कि viral वीडियो राजनीतिक प्रतीक और प्रशासनिक शिक्षा दोनों का काम कर रहा है।

प्रयागराज का यह रोटी वीडियो अब लंबे समय तक मीडिया और राजनीतिक चर्चा में रहेगा। यह घटना यह दिखाती है कि छोटे से दृश्य भी कैसे बड़े राजनीतिक अर्थ और बहस पैदा कर सकते हैं। प्रशासनिक अधिकारी, धार्मिक हस्तियाँ और राजनीतिक नेतृत्व इस घटना के माध्यम से अपनी भूमिका और प्राथमिकताओं को लेकर कई महत्वपूर्ण संदेश दे रहे हैं।अंत में यह कहा जा सकता है कि प्रयागराज में वायरल यह वीडियो उत्तर प्रदेश की राजनीति और प्रशासनिक संस्कृति का एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन गया है। यह सिर्फ एक प्रशासनिक दृश्य नहीं है, बल्कि राजनीतिक संकेत, सामाजिक आस्था और प्रशासनिक प्राथमिकताओं के बीच का संतुलन दिखाने वाला एक प्रतीक है। आने वाले समय में इस घटना के राजनीतिक और प्रशासनिक निहितार्थ और भी स्पष्ट होंगे, लेकिन अभी यह घटना जनता, प्रशासन और मीडिया के लिए एक चर्चा का विषय बनी हुई है।

Related Articles

Back to top button