2026 के चुनावी रण में पांच राज्यों की सियासत तय करेगी विपक्ष की असली ताकत
साल 2026 भारतीय राजनीति के लिए निर्णायक साबित होने वाला है। पांच राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव, राज्यसभा और निकाय चुनाव मिलकर एनडीए और इंडिया ब्लॉक दोनों की ताकत परखेंगे। इन नतीजों से न सिर्फ राज्यों की सरकारें, बल्कि देश की सियासी दिशा भी तय होगी।


साल 2026 भारतीय राजनीति के लिए साधारण चुनावी वर्ष नहीं है। यह वह साल है जब केंद्र की सत्ता में बैठी एनडीए सरकार और 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद खुद को विकल्प के रूप में पेश करने वाला इंडिया ब्लॉक, दोनों की राजनीतिक हैसियत जमीन पर परखी जाएगी। यही वजह है कि 2026 को सिर्फ राज्यों के चुनावों का साल नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति की अगली पटकथा लिखने वाला दौर माना जा रहा है। इस साल पांच राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में विधानसभा चुनाव होंगे, दर्जनों नगर निगम और निकाय चुनाव कराए जाएंगे और 75 राज्यसभा सीटों पर नए सदस्य चुने जाएंगे। इन सभी का सामूहिक असर देश की राजनीति की दशा और दिशा तय करेगा।
सबसे पहले विधानसभा चुनावों की बात करें तो 2026 में पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम और पुडुचेरी में वोटिंग होनी है। इन पांचों राज्यों की कुल विधानसभा सीटों की संख्या 824 है। पश्चिम बंगाल में 294, तमिलनाडु में 234, केरल में 140, असम में 126 और पुडुचेरी में 30 सीटें हैं। यह संख्या अपने आप में बताती है कि देश की लगभग एक चौथाई विधानसभा सीटों पर जनता का फैसला आने वाला है। यही कारण है कि इन चुनावों को 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले का सबसे बड़ा राजनीतिक सेमीफाइनल माना जा रहा है।
पश्चिम बंगाल की सियासत इस पूरे चुनावी चक्र का केंद्र बिंदु बनी हुई है। 2021 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने 213 सीटें जीतकर न सिर्फ सत्ता बरकरार रखी थी, बल्कि भाजपा के ‘मिशन बंगाल’ को भी बड़ा झटका दिया था। भाजपा 77 सीटों पर सिमट गई थी, जबकि कांग्रेस और वाम दल लगभग हाशिये पर चले गए थे। ममता बनर्जी 2011 से लगातार सत्ता में हैं और 2026 में वह चौथी बार मुख्यमंत्री बनने की कोशिश करेंगी। यह चुनाव उनके लिए सिर्फ जीत-हार का सवाल नहीं है, बल्कि यह तय करेगा कि बंगाल में उनका राजनीतिक प्रभुत्व बरकरार रहेगा या नहीं। दूसरी ओर भाजपा के लिए यह चुनाव अस्तित्व की लड़ाई जैसा है, क्योंकि 2021 के बाद से वह लगातार अपने जनाधार को बनाए रखने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस और वाम दलों की कमजोरी ने भाजपा को विपक्षी वोट मिलने का रास्ता नहीं दिया, बल्कि इन दलों का बड़ा हिस्सा तृणमूल की ओर शिफ्ट होता गया। यही वजह है कि बंगाल में असली मुकाबला ममता बनर्जी बनाम भाजपा बन चुका है।
दक्षिण भारत में तमिलनाडु की राजनीति सबसे ज्यादा दिलचस्प मोड़ पर है। 2021 में डीएमके ने 234 में से 133 सीटें जीतकर सत्ता में वापसी की थी। कांग्रेस ने 18 सीटें जीतकर गठबंधन में अहम भूमिका निभाई थी। एआईएडीएमके 66 सीटों तक सिमट गई थी और भाजपा को चार सीटें मिली थीं। लेकिन 2026 की तस्वीर पूरी तरह बदली हुई है। एआईएडीएमके और भाजपा के रिश्ते टूट चुके हैं और तमिल सिनेमा के लोकप्रिय अभिनेता थलपति विजय ने अपनी नई पार्टी बनाकर चुनावी मैदान में उतरने का ऐलान कर दिया है। इससे मुकाबला त्रिकोणीय हो गया है। डीएमके के सामने सबसे बड़ी चुनौती सत्ता दोहराने की है, क्योंकि तमिलनाडु में आमतौर पर सत्ता परिवर्तन का चलन रहा है। एमके स्टालिन के लिए यह चुनाव उनके शासन के कामकाज और नेतृत्व की सीधी परीक्षा होगा।
केरल में 2026 का चुनाव ऐतिहासिक बन सकता है। 2021 में वाम मोर्चे ने 99 सीटें जीतकर लगातार दूसरी बार सरकार बनाई थी और राज्य की दशकों पुरानी सत्ता परिवर्तन की परंपरा को तोड़ दिया था। मुख्यमंत्री पिनराई विजयन अगर 2026 में फिर जीत दर्ज करते हैं, तो वह केरल में लगातार तीन बार सत्ता में लौटने वाले पहले मुख्यमंत्री बन जाएंगे। दूसरी ओर कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूडीएफ सत्ता में वापसी के लिए पूरी ताकत झोंक रहा है। प्रियंका गांधी केरल से सांसद हैं और कांग्रेस के कई बड़े संगठनात्मक चेहरे इसी राज्य से आते हैं। ऐसे में केरल का चुनाव सिर्फ राज्य सरकार का नहीं, बल्कि वाम मोर्चे और कांग्रेस दोनों की राष्ट्रीय सियासत का पैमाना बन गया है। भाजपा भी केरल में अपने वोट प्रतिशत को बढ़ाने की कोशिश में है, हालांकि अभी तक उसे बड़ी कामयाबी नहीं मिली है।
असम में 2026 का चुनाव भाजपा के लिए हैट्रिक का इम्तिहान है। भाजपा 2016 से सत्ता में है और 2021 में उसने 126 में से 75 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी। कांग्रेस गठबंधन को उस चुनाव में 50 सीटें मिली थीं। मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा भाजपा के सबसे मजबूत क्षेत्रीय नेताओं में गिने जाते हैं और पार्टी उन्हें फिर से मुख्यमंत्री पद के चेहरे के रूप में आगे बढ़ा रही है। कांग्रेस के लिए यह चुनाव अपने लंबे राजनीतिक वनवास को खत्म करने का मौका है। असम में बदरुद्दीन अजमल की पार्टी के रूप में एक तीसरा मोर्चा भी मौजूद है, जो चुनावी गणित को जटिल बनाता है और सीधा असर परिणामों पर डाल सकता है।
पुडुचेरी भले ही छोटा केंद्र शासित प्रदेश हो, लेकिन यहां का चुनाव भी राजनीतिक संकेतों के लिहाज से अहम है। 2021 में ऑल इंडिया एनआर कांग्रेस और भाजपा गठबंधन ने 30 में से 16 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी। कांग्रेस सिर्फ दो सीटों पर सिमट गई थी। 2026 में यहां फिर से एनडीए और इंडिया ब्लॉक के बीच सीधी टक्कर मानी जा रही है, जिसका असर तमिलनाडु और दक्षिण भारत की राजनीति पर भी पड़ेगा।
इन विधानसभा चुनावों के साथ-साथ 2026 में 75 राज्यसभा सीटों पर भी चुनाव होने हैं। उत्तर प्रदेश की 10, बिहार की 5, महाराष्ट्र की 7, राजस्थान और मध्य प्रदेश की 3-3 सीटें खाली हो रही हैं। राज्यसभा के ये चुनाव संसद के उच्च सदन में ताकत के संतुलन को प्रभावित करेंगे। इसके अलावा महाराष्ट्र में मुंबई महानगरपालिका सहित 29 नगर निगमों के चुनाव और उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव भी होंगे। यूपी के पंचायत चुनावों को 2027 के विधानसभा चुनाव का सेमीफाइनल माना जा रहा है, क्योंकि इससे जमीनी सियासी रुझान का साफ संकेत मिलता है।
कुल मिलाकर 2026 का चुनावी साल एनडीए और इंडिया ब्लॉक दोनों के लिए निर्णायक है, लेकिन असली दबाव विपक्षी गठबंधन पर ज्यादा है। लोकसभा चुनाव के बाद विपक्षी एकता कितनी टिकाऊ है, यह इन चुनावों के नतीजों से साफ हो जाएगा। अगर इंडिया ब्लॉक इन राज्यों में मजबूत प्रदर्शन करता है, तो वह खुद को एक विश्वसनीय राष्ट्रीय विकल्प के रूप में स्थापित कर पाएगा। वहीं कमजोर नतीजे विपक्षी राजनीति में नई टूट-फूट और नए समीकरणों को जन्म दे सकते हैं। यही वजह है कि 2026 का चुनावी साल सिर्फ राज्यों की सरकारें नहीं, बल्कि देश की राजनीति की अगली दिशा तय करने वाला साबित होगा।



