कांग्रेस के भीतर राहुल बनाम प्रियंका की बहस कैसे नेतृत्व संकट और संगठन की बेचैनी उजागर करती है
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस नेतृत्व के संकट से गुजर रही है। राहुल गांधी की लगातार चुनावी हार के बीच प्रियंका गांधी वाड्रा एक प्रभावी विकल्प के रूप में उभरी हैं। यह बहस सिर्फ परिवार की नहीं, बल्कि पार्टी की पहचान, रणनीति और भविष्य की दिशा तय करने वाली है।


भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस इस समय सिर्फ चुनावी हार से नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व से जुड़े एक गहरे सवाल से जूझ रही है। यह सवाल है पार्टी को आगे कौन ले जाएगा और किस नेतृत्व में। पिछले दो दशकों में कांग्रेस की राजनीति जिस चेहरे के इर्द-गिर्द घूमती रही, वह चेहरा राहुल गांधी का रहा है। 2004 में अमेठी से सांसद बनने के बाद से राहुल गांधी को भविष्य का नेता माना गया। पार्टी ने संगठन, चुनाव प्रचार और वैचारिक संघर्ष हर मोर्चे पर उन्हें आगे रखा। लेकिन इन वर्षों में कांग्रेस का जनाधार जिस तरह सिमटा, उसने नेतृत्व को लेकर असहजता पैदा कर दी। 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में करारी हार, फिर 2024-25 के विधानसभा चुनावों में लगातार झटके इन सबने यह धारणा मजबूत की कि कांग्रेस के संकट का केंद्र सिर्फ संगठन नहीं, बल्कि नेतृत्व भी है। इसी माहौल में प्रियंका गांधी वाड्रा का नाम एक विकल्प के तौर पर उभरकर सामने आया है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार यह चर्चा नारेबाजी या भावनात्मक अपील तक सीमित नहीं है। पार्टी के भीतर से, और वह भी जिम्मेदार नेताओं की ओर से, प्रियंका की नेतृत्व क्षमता की खुली तारीफ और उन्हें आगे लाने की मांग सामने आई है। यह कांग्रेस की आंतरिक राजनीति में बड़ा बदलाव है, क्योंकि अब तक गांधी परिवार के भीतर तुलना से परहेज किया जाता रहा है।
कांग्रेस की राजनीति को समझने के लिए गांधी परिवार की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जवाहरलाल नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी और राजीव गांधी तक, पार्टी ने करिश्माई नेतृत्व के सहारे सत्ता और संगठन दोनों को साधा। सोनिया गांधी के दौर में भी कांग्रेस ने 2004 और 2009 में सत्ता हासिल की। इसके बाद पार्टी ने राहुल गांधी को आगे बढ़ाया, लेकिन परिणाम वैसा नहीं आया जैसा उम्मीद की गई थी। पिछले बीस वर्षों में कांग्रेस का वोट शेयर कई राज्यों में गिरा, संगठन कमजोर हुआ और क्षेत्रीय दलों ने उसकी जगह ले ली। यही वह पृष्ठभूमि है, जिसमें कार्यकर्ता अब सिर्फ परंपरा नहीं, बल्कि प्रभावशीलता की बात कर रहे हैं। प्रियंका गांधी लंबे समय तक सक्रिय राजनीति से दूर रहीं। पार्टी में उन्हें एक संभावित ‘ट्रंप कार्ड’ माना जाता था, लेकिन इस्तेमाल नहीं किया गया। 2019 में जब वे औपचारिक रूप से सामने आईं, तो उम्मीद थी कि वे उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में कांग्रेस को पुनर्जीवित करेंगी। चुनावी नतीजे भले अनुकूल न रहे हों, लेकिन उस दौर में पार्टी के भीतर एक नई ऊर्जा महसूस की गई। खासकर महिलाओं, युवाओं और किसानों के बीच प्रियंका की संवाद शैली को असरदार माना गया। यह बात अब भी कांग्रेस के आंतरिक फीडबैक में दोहराई जाती है।
2024 में लोकसभा पहुंचने के बाद प्रियंका गांधी की भूमिका राष्ट्रीय स्तर पर स्पष्ट हुई। संसद में उनके भाषणों ने ध्यान खींचा। वे मुद्दों को भावनात्मक अंदाज में उठाती हैं, लेकिन भाषा में कटुता नहीं होती। यही बात उन्हें अलग बनाती है। वंदे मातरम जैसे संवेदनशील विषय पर ऐतिहासिक संदर्भों के साथ जवाब देना हो या पड़ोसी देशों में अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचारों का मुद्दा उनका तरीका आक्रामक होने के बावजूद संतुलित रहता है। यही कारण है कि सत्ता पक्ष के कुछ नेताओं ने भी उनके भाषणों को गंभीरता से लिया। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की तुलना का एक बड़ा कारण उनकी सार्वजनिक मौजूदगी का फर्क है। राहुल गांधी लंबी यात्राएं करते हैं, बड़े मुद्दों पर तीखे बयान देते हैं और वैचारिक संघर्ष की राजनीति करते हैं। वहीं प्रियंका गांधी का तरीका अपेक्षाकृत शांत और संवादपरक माना जाता है। वे छोटे समूहों में मिलती हैं, गांवों में समय बिताती हैं और स्थानीय समस्याओं को सुनती हैं। पार्टी के कई नेताओं का मानना है कि यही तरीका कांग्रेस को फिर से जमीनी स्तर पर जोड़ सकता है।
2024-25 के विधानसभा चुनावों के नतीजों ने इस बहस को निर्णायक मोड़ दिया। महाराष्ट्र, हरियाणा और दिल्ली जैसे राज्यों में कांग्रेस की हार ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या मौजूदा नेतृत्व चुनावी राजनीति के लिए पर्याप्त है। इन्हीं नतीजों के बाद पार्टी के भीतर से आवाजें उठीं कि प्रियंका गांधी को अधिक केंद्रीय भूमिका दी जानी चाहिए। कुछ नेताओं ने सार्वजनिक रूप से यह भी कहा कि प्रियंका में वह करिश्मा है, जो भीड़ को जोड़ सकता है और पार्टी को नया चेहरा दे सकता है।इस चर्चा को और बल तब मिला, जब मनरेगा से जुड़े नए कानून के खिलाफ प्रस्तावित आंदोलन की रणनीति सामने आई। पार्टी के भीतर यह माना गया कि इस आंदोलन का खाका प्रियंका गांधी ने तैयार किया। इससे यह संकेत मिला कि वे सिर्फ भाषणों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि रणनीतिक स्तर पर भी सक्रिय हैं। हालांकि, एक अहम बैठक में उनकी गैरमौजूदगी ने सवाल भी खड़े किए। क्या वे जानबूझकर खुद को पीछे रख रही हैं, या फिर पार्टी के भीतर संतुलन बनाए रखने की कोशिश कर रही हैं यह साफ नहीं है।
कांग्रेस के अंदर यह भी चर्चा है कि प्रियंका गांधी पर अनावश्यक दबाव न डालने की रणनीति अपनाई जा रही है। पार्टी के वरिष्ठ नेता जानते हैं कि गांधी परिवार के भीतर खुला टकराव कांग्रेस के लिए घातक हो सकता है। इसलिए कोशिश यह है कि प्रियंका की भूमिका धीरे-धीरे बढ़े, बिना किसी औपचारिक ऐलान के। यही कारण है कि वे महासचिव होते हुए भी बिना स्पष्ट प्रोफाइल के काम कर रही हैं, लेकिन प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। दिलचस्प यह है कि राहुल गांधी खुद भी इस तुलना से असहज नहीं दिखते। उन्होंने सार्वजनिक मंचों पर प्रियंका के भाषणों की तारीफ की है। इससे यह संकेत मिलता है कि फिलहाल यह बहस व्यक्तिगत नहीं, बल्कि संगठनात्मक जरूरत से जुड़ी है। कांग्रेस के लिए यह सवाल अब टाला नहीं जा सकता कि वह किस चेहरे के साथ आगे बढ़ेगी।आज कांग्रेस जिस मोड़ पर खड़ी है, वहां सिर्फ परिवार की विरासत काफी नहीं है। कार्यकर्ता परिणाम चाहते हैं, संगठन स्थिरता चाहता है और मतदाता एक भरोसेमंद विकल्प। राहुल गांधी संघर्ष और वैचारिक राजनीति का प्रतीक हैं, जबकि प्रियंका गांधी उम्मीद और करिश्मे की छवि बनकर उभरी हैं। यही द्वंद्व कांग्रेस की मौजूदा राजनीति का सार है।यह बहस सिर्फ राहुल बनाम प्रियंका की नहीं है। यह उस पार्टी की पहचान की बहस है, जिसने देश की राजनीति को दशकों तक दिशा दी। आने वाला समय तय करेगा कि कांग्रेस इस तुलना को कमजोरी बनने देती है या इसे अपनी नई ताकत में बदल पाती है।



