तेजस्वी यादव की सियासत पर सबसे गंभीर प्रहार, महागठबंधन की जड़ें हिलाने वाला ऐतिहासिक जनादेश
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में एनडीए की ऐतिहासिक जीत और महागठबंधन की करारी हार ने राज्य की राजनीति को हिला दिया। तेजस्वी यादव की नेतृत्व क्षमता, आरजेडी की गुटबाजी, कमजोर संगठन और बिखरे वोट समीकरण ने परिणाम तय किए। यह हार तेजस्वी के लिए पार्टी, परिवार और राजनीति तीनों मोर्चों पर गंभीर चुनौती बन गई।


वरिष्ठ पत्रकार
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 का नतीजा केवल एक चुनावी फैसला नहीं, बल्कि राज्य की राजनीतिक धारा को झकझोर देने वाली घटना साबित हुआ है। एनडीए की ऐसी सुनामी आई कि महागठबंधन का किला अंदर तक बिखर गया। कुल 243 सीटों में से एनडीए को लगभग 200 से अधिक सीटें मिलीं और महागठबंधन 35 से भी कम पर सिमट गया। यह फैसला आकड़ों का खेल भर नहीं है; यह नेतृत्व, संगठन, रणनीति, सामाजिक समीकरण और भविष्य की दिशा से जुड़े कठोर सवाल खड़ा करता है। चुनावी जमीनी हकीकत जितनी क्रूर थी, उतनी ही स्पष्ट भी बिहार की जनता ने इस बार किसी तरह की दुविधा नहीं छोड़ी।तेजस्वी यादव चुनाव का चेहरा थे। उनके हाथ में ही महागठबंधन की कमान थी। पिछला विधानसभा चुनाव जहाँ उन्हें सबसे बड़ी पार्टी की ताकत दिला गया था, वहीं 2025 के नतीजों ने उनकी राजनीतिक पकड़ पर गहरा प्रहार कर दिया। आरजेडी सिर्फ 25–26 सीटों पर अटक गई। कांग्रेस को 4–6 सीटें, वाम दलों को मुश्किल से 2–3 सीटें, जबकि एनडीए में भाजपा और जेडीयू मिलकर 170 से अधिक सीटें ले गए। यह अंतर सिर्फ हार नहीं, राजनीति में गिरते भरोसे का पैमाना भी है।
तेजस्वी यादव ने पूरे बिहार में बड़े पैमाने पर रैलियाँ कीं। लेकिन भीड़ का शोर वोट में तब्दील नहीं हुआ। चुनावों में यह एक बड़ा सबक माना जाता है कि रैलियों की गूंज से ज़मीन का मिजाज़ नहीं बदलता। उनके सामने जो सबसे बड़ी चुनौती आई, वह नेतृत्व के प्रति जनता का असंतोष रहा। दो चुनाव लगातार बड़े अंतर से हारना किसी भी नेता के लिए भारी संकट का संकेत है। लोकसभा 2024 में आरजेडी सिर्फ 4 सीटों पर सिमटी थी, और अब विधानसभा में यह गिरावट और तीव्र हो गई। महागठबंधन को बचाने वाला कोई चमत्कार नहीं हुआ, बल्कि सीट-दर-सीट उसकी पकड़ टूटती गई। महागठबंधन की सबसे कमजोर कड़ी बना गठबंधन प्रबंधन। सीट शेयरिंग पर शुरू से लेकर आख़िरी दौर तक तनाव बना रहा। कांग्रेस और आरजेडी के बीच मनमुटाव इतना बढ़ा कि कई सीटों पर फ्रेंडली फाइट हुई। स्थानीय नेताओं ने खुलेतौर पर असंतोष जताया। कई जगह उम्मीदवारों की घोषणा के बाद विरोध, बगावत और चुनाव मैदान में दो-दो कैंडिडेट उतरने जैसी स्थिति बनी। गठबंधन की रणनीति न बिखराव को रोक सकी, न संदेश को एकजुट कर सकी। इसके उलट एनडीए ने बूथ से लेकर जिला स्तर तक अपना समीकरण पहले से मजबूत कर रखा था।
तेजस्वी यादव के लिए एक और बड़ी चुनौती है आरजेडी के भीतर की राजनीतिक गुटबाजी। परिवारवाद का आरोप नया नहीं है, लेकिन इस बार यह अंदरूनी चोट जैसा उभरकर सामने आया। तेज प्रताप यादव की बगावत, नई पार्टी का गठन, चुनाव लड़ना और हार के बाद तेजस्वी पर किए कटाक्ष ये सब घटनाएँ आरजेडी के अंदर गहरे फूट की ओर इशारा करती हैं। तेज प्रताप ने तेजस्वी को “फेलस्वी” तक कहा, और “झुनझुना” शब्द का इस्तेमाल कर माहौल को और तीखा कर दिया। लालू प्रसाद यादव की बिगड़ती सेहत और राबड़ी देवी की निष्क्रियता ने तेजस्वी को नेतृत्व का पूरा भार अकेले उठाने पर मजबूर कर दिया, लेकिन वे इस बोझ को ढो नहीं पाए।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि एम–वाई समीकरण (मुस्लिम–यादव) अब उतना मजबूत नहीं रहा जितना कभी लालू प्रसाद यादव के दौर में होता था। मुस्लिम मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा जेडीयू और AIMIM की ओर गया। सीमांचल में AIMIM ने अपनी पकड़ फिर मजबूत की, जिससे मुसलमानों में आरजेडी का परंपरागत प्रभाव कमजोर हुआ। कई सीटों पर मुस्लिम मतों का विभाजन सीधे एनडीए के पक्ष में गया। यह प्रवृत्ति तेजस्वी के लिए आने वाले वर्षों में और भी बड़ी चुनौती बनेगी, क्योंकि एम–वाई ही आरजेडी की रीढ़ है। यादव वोटों में भी नए क्षत्रप उभर रहे हैं नित्यानंद राय, पप्पू यादव, राज बल्लभ यादव जैसे नेता अपनी स्वतंत्र सियासी छवि बना रहे हैं और अब कोई भी सीधे आरजेडी का वफादार वोटर नहीं रहा।
संगठन का क्षरण भी कम गंभीर नहीं है। 2020 के चुनाव में जीते हुए आरजेडी के आधा दर्जन विधायक पाला बदलकर जेडीयू-भाजपा में चले गए थे। सत्ता से बाहर रहने पर यह समस्या और बड़ी होती है। अब जब पार्टी के पास न सत्ता है, न मजबूत जनादेश, ऐसे में विधायकों और जिला स्तर के नेताओं को जोड़े रखना तेजस्वी के लिए कठिन होगा। आरजेडी के कई पुराने चेहरे पहले ही हताश हो चुके हैं और कुछ अपने भविष्य की सुरक्षा के लिए नए विकल्प तलाश रहे हैं। पार्टी की जड़ें तभी मजबूत होंगी जब तेजस्वी नेतृत्व में आत्मालोचना और पुनर्गठन का ईमानदारी से प्रयास करेंगे।महागठबंधन के भीतर कांग्रेस की भूमिका भी विवादों से भरी रही। कांग्रेस लंबे समय से बिहार में पुनर्जीवन चाहती है, लेकिन संगठन की कमजोरी, जमीनी नेटवर्क की कमी और नेतृत्व के दोहरे संदेश ने उसे महागठबंधन में बोझ बना दिया। कई सीटों पर कांग्रेस की उपस्थिति सिर्फ औपचारिक रही, जिससे संयुक्त लड़ाई कमजोर हुई। आरजेडी के रणनीतिकारों का मानना है कि कांग्रेस को दी गई सीटों में आधी ऐसी थीं जहाँ जीत की कोई संभावना ही नहीं थी, लेकिन गठबंधन की मजबूरी में उन्हें समायोजित करना पड़ा।
इस हार ने तेजस्वी यादव को तीन बड़े मोर्चों पर खतरे में डाल दिया है पार्टी,परिवार,पॉलिटिक्स।यही “ट्रिपल-पी” आज सबसे बड़ा संकट बनकर खड़ा है। पार्टी टूट रही है, परिवार बिखर रहा है और राजनीति अस्थिर है। ऐसे में तेजस्वी का अगला कदम आरजेडी के भविष्य को तय करेगा। उन्हें एक नए ढांचे की जरूरत होगी, जहाँ संगठन मजबूत हो, गठबंधन का आधार व्यापक हो और राजनीति सिर्फ एम–वाई समीकरण तक सीमित न रहे।बिहार के इस चुनाव ने यह भी स्थापित कर दिया है कि जनता अब केवल भावनात्मक भाषणों या बड़े वादों से प्रभावित नहीं होती। सुशासन, स्थिरता, विकास, कल्याण योजनाएँ और राजनीतिक स्पष्टता ही आज का वोटर देख रहा है। एनडीए की वापसी इसी विश्वास की जीत है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और भाजपा की संयुक्त रणनीति ने यह स्पष्ट कर दिया कि यदि गठबंधन स्थिर और लक्ष्यभेदी हो तो जनता उसे भारी बहुमत से सत्ता दे सकती है।तेजस्वी यादव के सामने अब सियासत के सबसे कठिन दिन हैं। उनके पिता की विरासत बड़ी थी, लेकिन उस विरासत को संभालने के लिए नेतृत्व में दृढ़ता, संयम, दूरदर्शिता और राजनीतिक धैर्य चाहिए और यही गुण अब परीक्षा पर हैं। यह दौर उन्हें तोड़ भी सकता है, और सही रणनीति अपनाई जाए तो गढ़ भी सकता है। पर एक बात साफ है बिहार की राजनीति अब उनके लिए पहले जैसी आसान नहीं रह गई है। महागठबंधन की यह करारी हार आने वाले कई वर्षों तक उनके हर राजनीतिक कदम की कसौटी बनेगी।



